April 30, 2026

ना जाने क्यूँ उम्रदराज़ लोगों को हर बात पर ये लगता है की अब सब कुछ पहले जैसा नहीं ।

एक्सपोज़ टुडे, भोपाल।
लेखक डॉ आनंद शर्मा रिटायर्ड सीनियर आईएएस हैं और वर्तमान में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी है।

रविवारीय गपशप
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ना जाने क्यूँ उम्रदराज़ लोगों को हर बात पर ये लगता है की अब सब कुछ पहले जैसा नहीं है , हालाँकि ऐसा होता नहीं है | शायद इसी वजह से मुझे भी यह लगता है की आज़ादी के जश्न मनाने में अब वैसी बात नहीं रही जो तब होती थी जब हम छोटे थे | महीनों पहले से स्कूल में पंद्रह अगस्त की तैय्यारी शुरू हो जाती | कोई गीत की रिहर्सल करता कोई संगीत की , कोई डाँस की तो कोई संभाषण कला में हाथ आज़माता पर शायद ही कोई बालक या बालिका ऐसी होती जो कुछ ना कर रही हो |
नौकरी जब लगी तो स्वतंत्रता दिवस को समारोहपूर्वक मनाने की ज़िम्मेदारी ही हमारे पास आ गयी | जिस ज़िले या तहसील में पदस्थापना होती समारोह के पूर्व स्कूली बच्चों की रिहर्सल से लेकर परेड दलों के आरम्भिक तैय्यारी को परखने और उसे समारोह के अनुरूप घोषित करने का दायित्व हमने खूब निभाया | इससे जुड़े कुछ दिलचस्प क़िस्से आपकी नज़र हैं |
स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के समारोह में जब मुख्य अतिथि , जो बहुधा शासन के मंत्री होते हैं , परेड की सलामी लेने खुली जीप में सवार होकर मैदान में खड़े दलों के अवलोकन के लिए जाते हैं तो उनके साथ कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को खड़े होने का मौक़ा मिलता है | परेड का कमांडर जो बहुधा रक्षित निरीक्षक होता है वो भी इस अवसर पर खुले वाहन के सबसे पीछे खड़ा रहता है | ये परम्परा के साथ सम्मान और गौरव के क्षण होते हैं | इसकी रिहर्सल भी पहले से कई बार की जाती है , फ़र्क़ केवल ये रहता है कि तब मंत्री जी की जगह किसी एस डी एम को खड़ा कर देते हैं | विदिशा ज़िले में जब मैं कलेक्टर था तो स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हम प्रभारी मंत्री जी के साथ खुली जिप्सी में सवार होकर परेड दलों के निरीक्षण के लिये निकले तो दलों के समक्ष पहुँचने पर रक्षित निरीक्षक ने अपनी बुलन्द आवाज़ में दल के मुखिया को मंत्री जी का अनुष्ठानिक अभिवादन करने की कमांड दी | दल के मुखिया एक एक करके अपने दलों के साथ सेल्यूट करते जा रहे थे तभी मैंने देखा की रक्षित निरीक्षक की बुलन्द आवाज़ को सुनकर घर में बंधा उसका पालतू जर्मन शेफ़र्ड चेन तोड़ के दौड़ कर जिप्सी के पिछले दरवाज़े से कूद कर अपने स्वामी के पैरों के पास आकर बैठ गया है | मेरी तो जैसे साँस ठहर गयी , एस पी की ओर देखा तो वो नज़रों में ज्वाला भरे आर आइ साहब को घूर रहे थे | मंत्री जी अलबत्ता इस सबसे बेख़बर लोगों का अभिवादन स्वीकार करने में मशगूल थे | मैंने एस पी साहब को धीमे से इशारा किया की जो भी हो वो अब बाद में ही करना | वाहन वापस जब मंच के समीप पहुँचा तो हम मंत्री जी को लेकर पोडियम के पास ले कर आए और तब तक आर आइ साहब ने उस बेज़ुबान फ़ैन को किसी के हाथ घर की ओर चुपके से रवाना कर दिया | कार्यक्रम के बाद हमने मंत्री जी से इस भूल के लिए माफ़ी माँगी , मंत्री जी उदारमना थे उन्होंने मुस्कुरा कर हम सब को माफ़ कर दिया |
हमारी नौकरी में कुछ आवश्यक प्रशिक्षण कार्यक्रमों के चलते हमें विदेश जाने का अवसर भी मिलता है | भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के लिए ऐसे ही एक ट्रेनिंग कार्यक्रम का समापन सत्र अमरीका में होना था | एक सप्ताह के लिए नियत इस अवधि में हम सिराक्यूस और न्यूयार्क गए थे | ट्रेनिंग के दौरान तो हमें नियत सत्र अनुसार ही भ्रमण करना होता है लेकिन प्रशिक्षण दल के अभ्यर्थी नियमानुसार लौटने के पूर्व दो तीन दिन रुकने की पात्रता रखते थे सो अधिकांश लोगों की तरह मैंने भी न्यूयार्क और वाशिंगटन घूमने के लिए तीन दिन का अवकाश ले लिया | अमरीका गए थे सो घर वालों की माँगों की पूर्ति के लिए ख़रीदारी अंतिम दिन करने का निर्णय मैंने लिया था | लौटने का अंतिम दिन था 5 जुलाई , जो अमेरिका का स्वतंत्रता दिवस था | सुबह निकल कर जब हम न्यूयार्क के बाज़ारों में ख़रीददारी के उद्देश्य से निकले तो ये देख कर हैरान रह गए की बाज़ारवादी व्यवस्था के हिमायती इस देश का तो पूरा का पूरा बाज़ार बंद था | सारे लोग जश्न के माहौल में थे , हर घर के सामने फूलों की सुंदर सजावट और रौशनी थी | क्या कर सकते थे ख़रीददारी की योजना तो चौपट हो ही चुकी थी तो दिन का सदुपयोग हमने आस पास के स्थान जैसे स्टेच्यु आफ लिबर्टी और ट्विन टावर के प्रतीक वन टावर को देखने में बिताया और रात को हडसन नदी के किनारे बेमिसाल आतिशबाजी को देखकर हम भारत के लिए रवाना हो गये |

Written by XT Correspondent

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