लेखक डॉ आनंद शर्मा सीनियर आईएएस अफसर हैं और पूर्व मुख्यमंत्री के विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी रहे हैं।
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रविवारीय गपशप
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किसी भी नौकरी या प्रोफेशन में परिवीक्षा काल बड़े महत्व का होता है , इस शैशव काल में व्यक्ति जिन अनुभवों से गुजरता है , उसका प्रभाव उसके पूरे जीवन पर रहता है । बात बड़ी पुरानी है , तब मैं डिप्टी कलेक्टर के पद पर चयनित होकर राजनांदगांव जिले में परिवीक्षाधीन डिप्टी कलेक्टर के पद पर पदस्थ हुआ था , और मुझे डोंगरगढ़ में एस.डी.एम. के रूप मे पदस्थ किया गया था । एक दिन की बात है देर रात कुछ लोग किसी समस्या के लिए मेरे निवास पर आए । मुझे लगा सरकारी काम की बात करने तो कार्यालय आना चाहिये, तो मैंने सबको बिना सुने वापस करते हुए कहा की कल सुबह ऑफिस आना तभी बात करेंगे । दूसरे दिन सुबह सुबह कलेक्टर का फोन आया , और उन्होंने पूछा की कल रात आप के पास कुछ लोग समस्या लेकर आए थे और अपने बिना सुने उन्हें वापस कर दिया । मैं कुछ घबराया पर अपनी सफाई देते हुए बोला कि सरकारी कामकाज तो दफ्तर में ही होता है सो मैंने उन्हें दफ्तर में आने को कहा था । कलेक्टर ने बड़े प्रेम से समझाया कि कोई इतनी रात आपके पास आता है इसका मतलब है कि कोई गंभीर बात है , हमारी नौकरी केवल कार्यालय की नौकरी नहीं है क्या पता कब कोई बात कहाँ तक चली जाए । मैंने बात गाँठ बाँधी , और फिर कभी सुनने में कोताही नहीं की ।
उज्जैन में मैं जब एस.डी.एम. के रूप में पदस्थ हुआ तो मेरे पास दो नए परिवीक्षाधीन नायब तहसीलदारों को ट्रेनिंग के लिए भेजा गया । तब मैं महाकाल मंदिर का प्रशासक भी हुआ करता था , तो पर्व में जब भीड़ बढ़ा करती तो कई बार मैं उन्हें मंदिर की ड्यूटी पर भी लगाता, ताकि वे भीड़ प्रबंधन और व्यवस्था सीख सकें । उन दिनों हम परिवार में नए सदस्य का इंतिजार कर रहे थे , और उज्जैन से इंदौर की सड़क इतनी बुरी स्थिति में थी कि पत्नी को चेकअप के लिए डाक्टर के पास ले जाने से भी डर लगता था । इंदौर में प्रसूति की विशेषज्ञ डाक्टर भागवत को हम दिखाया करते थे , उनसे मैंने परेशानी कही तो वे बोलीं उज्जैन मेरे बेटी की ससुराल है , मैं उज्जैन जाती रहती हूँ यदि तुम मुझे मंदिर में महाकाल के दर्शन करवा दो तो मैं तुम्हारी पत्नी को उज्जैन में तुम्हारे घर आकर ही देख लूँगी । मैंने प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया । कुछ दिनों बाद उनका फ़ोन आया कि वे आज आने वाली हैं तो घर आकर वे चेकअप कर लेंगी । मुझे उनकी शर्त याद थी , लेकिन उस दिन किसी आवश्यक काम से मुझे बाहर दौरे पर जाना था तो मैंने उनके ड्राइवर को घर का पता समझाया , और किसी त्योहार का दिन था तो पूर्व से ड्यूटी पर लगे उन परिवीक्षाधीन नायब तहसीलदारों को कहा कि मंदिर आने पर डाक्टर साहिबा को विशेष दर्शन के टिकट लेकर दर्शन करवा देना । उन दिनों सौ रुपये के टिकट पर शीघ्र दर्शन की व्यवस्था लागू हो चुकी थी । अपना सरकारी काम खत्म कर दूसरे दिन जब मैं मंदिर गया तो दोनों नवजवान मेरे पास आए और रिपोर्ट की कि डाक्टर साहिबा को बढ़िया दर्शन हो गए थे । मैंने पर्स निकालते हुए उनसे पूछा कितने लोगों का टिकट लिया था , तो उन्होंने कहा कि , सर डाक्टर साहिबा समेत वे तीन लोग थे पर हमने यूज्ड टिकट का उपयोग कर उन्हें दर्शन करवा दिए थे , किसी को पता नहीं लगा , आप चिंता न करो । मेरे मुँह से निकला किसी को पता नहीं लगा हो महाकाल को तो पता था ? हम जो दूसरों के लिए नियम बना रहे हैं उन्हें ख़ुद भी पालन करने होंगे , तभी व्यवस्था क़ायम रहेगी और अपने पर्स से तीन सौ रुपये निकाल कर उनसे कहा इसकी शीघ्र दर्शन टिकट लेकर फाड़ दो ताकि हिसाब बराबर हो जाए ।