लेखिका मानसी द्विवेदी इतिहास की शिक्षिका हैं।
ईमेल:- educatormanasidwivedi@gmail.com
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मानव सभ्यता का इतिहास केवल राजाओं के शौर्य, युद्धों की रणनीति या विजयों के उद्घोष तक सीमित नहीं है। यह प्रकृति और मनुष्य के बीच स्थापित एक गहरे और आध्यात्मिक संबंध की गाथा है। हमारे पूर्वजों ने सदैव इस धरती को जीवन का आधार माना। उनके लिए नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि पूजनीय देवी थीं, वहीं पर्वत देवताओं का निवास थे और वृक्ष जीवन का प्रतीक। आज जब प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और वनों की अंधाधुंध कटाई जैसी समस्याएँ मानव अस्तित्व को चुनौती दे रही हैं, तब इतिहास और धर्मग्रंथों के पन्नों में अंकित शिक्षाएँ हमें यह सिखाती हैं कि प्रकृति के साथ सामंजस्य ही जीवन की सच्ची और स्थायी राह है। जैसा कि कवि सुमित्रानंदन पंत ने कहा है कि—
“प्रकृति का विराट रूप, मानव की आत्मा का दर्पण।”
ऋग्वेद में प्रकृति की पूजा का विस्तृत वर्णन मिलता है। वहाँ वायु, अग्नि, सूर्य, पृथ्वी और जल को देवता रूप में स्वीकार किया गया है। ‘भूमि सूक्त’ में पृथ्वी माता को संबोधित करते हुए कहा गया है कि—“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।” जिसका अर्थ है कि “पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ।”यह मंत्र इस बात का प्रमाण है कि भारत की प्राचीन सभ्यता ने हजारों वर्ष पहले ही पर्यावरणीय चेतना को धार्मिक आस्था का रूप दे दिया था।
पुराणों में भी वृक्ष, नदियाँ और पशु-पक्षी जीवन के अभिन्न अंग माने गए हैं। पद्म पुराण और स्कंद पुराण में लिखा गया है कि जो व्यक्ति एक पीपल, नीम या तुलसी का पौधा लगाता है, वह हजार यज्ञों का फल प्राप्त करता है। भागवत पुराण में वृक्षों को “परहित के लिए जन्मे प्राणी” कहा गया है, क्योंकि वे बिना किसी अपेक्षा के सभी को छाया, फल और प्राणवायु देते हैं। इन ग्रंथों ने स्पष्ट संदेश दिया कि प्रकृति का संरक्षण केवल भौतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक कर्तव्य है।
इतिहास में आगे बढ़ते हुए, मगध की भूमि पर चंद्रगुप्त मौर्य का शासन था। एक बार प्रदेश में भयंकर सूखा पड़ा। नदियाँ सूख गईं, फसलें नष्ट हो गईं और जनता पीड़ा में डूब गई। सम्राट ने अपने गुरु चाणक्य से समाधान पूछा। चाणक्य ने कहा, “राजन्, जब तक हम धरती को माता की तरह नहीं मानेंगे, वह हमें अन्न नहीं देगी। वृक्षों की रक्षा ही राज्य की वास्तविक रक्षा है।” यह वचन सुनकर चंद्रगुप्त ने आदेश दिया कि प्रत्येक गाँव में वृक्ष लगाए जाएँ, और जो गाँव सबसे अधिक वृक्ष उगाएगा, उसे कर में छूट दी जाएगी। परिणामस्वरूप भूमि फिर से हरी-भरी हो गई। महल के आँगन में एक आम का पेड़ लगाया गया, जिसके नीचे चंद्रगुप्त न्याय देने लगे। वह पेड़ “राजवृक्ष” कहलाया और आने वाली पीढ़ियों के लिए शासन और प्रकृति के सामंजस्य का प्रतीक बन गया।
चंद्रगुप्त के पौत्र सम्राट अशोक ने भी पर्यावरण और करुणा को शासन का आधार बनाया। कलिंग युद्ध के रक्तपात के बाद उन्होंने हिंसा त्यागकर धम्म नीति अपनाई। उनके शिलालेखों में स्पष्ट लिखा गया कि राज्यभर में वृक्ष लगाए जाएँ, पशु-पक्षियों की रक्षा हो, यात्रियों के लिए कुएँ और उद्यान बनाए जाएँ। अशोक का यह दृष्टिकोण आज भी हमें याद दिलाता है कि जब शासक का हृदय करुणा से भरा होता है, तब प्रकृति भी मुस्कराती है। उन्होंने धर्म और पर्यावरण को एक ही सूत्र में पिरोया और संदेश दिया कि “दया धर्म का मूल है, वृक्ष ही जीवन-मूल।”
पर्यावरण संरक्षण की भावना केवल शासकों की नीतियों में ही नहीं, बल्कि जन-आस्था और आत्मबलिदान में भी जीवित रही। सत्रहवीं शताब्दी में राजस्थान के बिश्नोई समाज ने अपने संत गुरु जम्भेश्वर के बताए 29 नियमों को जीवन का आधार बनाया, जिनमें वृक्षों और जीवों की रक्षा सर्वोपरि थी। 1730 ईस्वी में जब जोधपुर के राजा के सैनिकों ने महल निर्माण के लिए खेजड़ी के वृक्ष काटने की कोशिश की, तो गाँव की वीरांगना अमृता देवी बिश्नोई ने वृक्षों को अपनी भुजाओं से आलिंगन में भर लिया और कहा — “सिर तो कट सकता है, पर वृक्ष नहीं।” सैनिकों ने निर्दयतापूर्वक उन्हें और 363 ग्रामीणों को मार डाला, पर उनके बलिदान ने इतिहास में अमर स्थान पा लिया। इसी भावना ने सैकड़ों वर्ष बाद उत्तराखंड की महिलाओं को प्रेरित किया, जिन्होंने 1970 के दशक में “चिपको आंदोलन” शुरू किया। उन्होंने पेड़ों से लिपटकर उनकी रक्षा की और पूरी दुनिया को यह सिखाया कि प्रकृति के प्रति समर्पण ही सच्ची भक्ति है।
मुगल काल में सम्राट अकबर ने भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किए। उन्होंने “चरखाना” नामक विभाग बनवाया, जो बागवानी और उद्यानों की देखभाल करता था। अकबर ने आगरा और फतेहपुर सीकरी जैसे नगरों में हरे-भरे उद्यान बनवाए और आदेश दिया कि हर नए नगर के साथ एक जलाशय और वृक्षों की श्रृंखला बनाई जाए, ताकि वातावरण संतुलित और शुद्ध बना रहे। यह दृष्टिकोण शहरी नियोजन में पर्यावरण की भूमिका को रेखांकित करता है।
औपनिवेशिक ब्रिटिश काल में जब वनों को आर्थिक लाभ के लिए काटा गया, तब भारत की प्रकृति ने गहरा घाव झेला। परंतु महात्मा गांधी ने अपने विचारों से इस दिशा में एक नई चेतना जगाई। उन्होंने कहा, “धरती सभी की आवश्यकता पूरी कर सकती है, लेकिन किसी एक की लालच नहीं।” गांधीजी के लिए पर्यावरण संरक्षण केवल नीति नहीं, बल्कि जीवन का नैतिक मूल्य था। उन्होंने ग्राम स्वराज, स्वच्छता, जल संरक्षण और वृक्षारोपण को आत्मनिर्भर भारत का अंग माना।
स्वतंत्रता के बाद जब देश ने तीव्र विकास की दिशा में कदम बढ़ाए, तब पर्यावरणीय संतुलन भी बिगड़ने लगा, पर भारत ने इतिहास से प्रेरणा लेते हुए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। 1972 में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और 1973 में वन्यजीव संरक्षण कानून लागू किए गए। आधुनिक भारत में सुंदरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में पुनर्जीवित चिपको आंदोलन और मेधा पाटकर के नर्मदा बचाओ आंदोलन ने लोगों को फिर से प्रकृति की ओर लौटने का संदेश दिया।
इन सभी ऐतिहासिक और धार्मिक प्रसंगों से एक शाश्वत संदेश निकलता है कि प्रकृति केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, सभ्यता और अस्तित्व की आत्मा है।
सभी कालों में चाहे वो ऋग्वेद, पुराण, मौर्य, मुगल या आधुनिक भारत होसबकी एक ही वाणी है कि यदि पृथ्वी को माता माना जाए, तो उसका सम्मान करना भी हमारा धर्म है।
