लेखिका निधि शर्मा योगाचार्य है विगत 8 वर्षों से अष्टांग योग (आसान, ध्यान) पर काम कर रही हैं।
एक्सपोज़ टुडे।
प्रकृति पुरुष के समक्ष नृत्य कर रही है परंतु पुरुष तटस्थ और एकाग्र है योग की भाषा शैली में समझें तो
वह त्राटक है यानी कि पूरी तरह से प्रकृति के नाच को देख रहा है किसी तरह की संवेदनाएं उसके भीतर नहीं उठ रही है!
ठीक उसी तरह से हमारे भीतर विचार प्रति पल नृत्य करते हैं सामान्य भाषा में कहें, स्त्री पुरुष एक ही है हम कभी स्त्री हो जाते हैं तो कभी पुरुष हो जाते हैं हम शारीरिक ढांचे से थोड़ा एक दूसरे की बनावट में भिन्न है पर सूक्ष्म शरीर से हम पूरी तरह से एक है,अतः हमारा बाहरी शरीर विचारों के कारण ही इतना अस्त-व्यस्त है हम विचारों की प्रक्रिया को समझ लेंगे तो हमारा जीवन भी पूरी तरह से तटस्थ एकाग्र हो जाएगा हम पूरी तरह से पुरुष की भांति प्रकृति के स्वतंत्र नाच को देख सकेंगे और अपने जीवन को भी स्वतंत्र, सरल और सहज बना सकते हैं! तथा योग के माध्यम से हम इस पूरी प्रक्रिया को जी सकते हैं “योग” का यही उद्देश्य जीवन को सरल और सहज बनाना है।
लेखिका निधि शर्मा की योग की यात्रा 2014 से शुरू हुई है योग में 1 वर्षीय डिप्लोमा एवं मास्टर ऑफ योगा है एम ए हिंदी साहित्य में किया है ग्रेजुएशन भी हिंदी साहित्य में किया है तथा
विगत 8 वर्षों से अष्टांग योग (आसान, ध्यान) का प्रचार प्रसार एवं अनुभव दिव्यांग बच्चों एवं लोगों तक पहुँचाने का प्रयास कर रही रही हैं।
विगत 8 वर्षों से अष्टांग योग (आसान, ध्यान) का प्रचार प्रसार एवं अनुभव दिव्यांग बच्चों एवं लोगों तक पहुँचाने का प्रयास कर रही रही हैं।