भारत की आधी आबादी, अर्थव्यवस्था का पूरा समाधान
लेखक: अनुरोध ललित जैन
(राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (अल्पसंख्यक विभाग) एवं सामाजिक आर्थिक विश्लेषक)
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आज भारत की $4.19 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था वैश्विक विकासगाथा का एक प्रमुख अध्याय है और देश दुनिया की तीसरी सबसे बड़ीअर्थव्यवस्था बनने की राह पर अग्रसर है। लेकिन इस प्रगति पर अब एकगंभीर खतरा मंडरा रहा है: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 27 अगस्त2025 से भारतीय निर्यातों पर प्रस्तावित 50% का भारी–भरकम टैरिफ।यह टैरिफ $40 बिलियन के व्यापार को निशाना बनाता है, जिससे भारतके सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 1% की कमी आ सकती है।सबसे चिंताजनक बात यह है कि ये टैरिफ उन श्रम–प्रधान क्षेत्रों में लाखोंभारतीय महिलाओं के रोजगार को अस्थिर करने की धमकी देते हैं, जहाँउनकी भागीदारी सबसे अधिक है। कपड़ा और रत्न जैसे क्षेत्र, जो लगभग5 5 करोड़ लोगों को रोजगार देते हैं, 50% तक के निर्यात में गिरावट कासामना कर सकते हैं।
इसके विपरीत, चीन अपनी विशाल विनिर्माण क्षमता और अफ्रीका, यूरोपजैसे क्षेत्रों में निर्यात विविधीकरण के कारण अमेरिकी टैरिफ की चुनौतीका सामना करने में सक्षम रहा, जबकि भारत इस मामले में अधिकअसुरक्षित है। इसकी दो मुख्य वजहें हैं: एक तो भारत का 18% निर्यातअमेरिका पर निर्भर है, और दूसरा, वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धियों की तुलनामें भारतीय उत्पाद 30-35% तक महंगे हैं, जो एक बड़ी चुनौती है। ऐसेसंकट के समय में, महात्मा गांधी के शब्द प्रासंगिक लगते हैं: “किसी राष्ट्रकी ताकत उसकी महिलाओं की ताकत में निहित होती है।” आज आधीआबादी को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में भारत की विफलता केवलएक सामाजिक चिंता नहीं, बल्कि भविष्य की एक रणनीतिक विफलताबन सकती है।
आर्थिक विकास में महिलाओं की कम भागीदारी और टैरिफ की दोहरीमार
भारत में महिला श्रम बल की बेहद कम भागीदारी है, जो 37% से 41.7% के बीच बनी हुई है, जबकि वैश्विक औसत और चीन की दर लगभग 60% है। चीन, जापान और अमेरिका जैसे देश इस बात का प्रमाण हैं कि जबमहिलाएँ अर्थव्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभाती हैं, तो समावेशी विकाससंभव हो पाता है। जापान ने ‘वुमेनॉमिक्स‘ रणनीति अपनाकर महिलाभागीदारी को 74% तक पहुँचाया, वहीं अमेरिका में भी महिलाओं कीभागीदारी से अर्थव्यवस्था को ट्रिलियन डॉलर के स्तर तक मजबूती मिलीहै। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) का अनुमान है कि इस लैंगिक अंतर कोसमाप्त करने से भारत 2025 तक अपनी GDP में 27% यानी $770 बिलियन की वृद्धि कर सकता है। 2047 तक यह आंकड़ा $14 ट्रिलियनतक पहुंच सकता है। लेकिन इस क्षमता के रास्ते में सांस्कृतिकरूढ़िवादिता, नीतिगत निष्क्रियता और रोजगार के लिए प्रणालीगत बाधाएँआड़े आती हैं। अब, जब डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर टैरिफ थोप दिए हैं, जिससे टेक्सटाइल और जेम्स–जैसे ऐसे क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं जहाँबड़ी संख्या में महिलाएँ कार्यरत हैं, तब यह दोहरी मार जैसी स्थिति बनगई है। महिलाओं की पहले से कम भागीदारी और अब उन क्षेत्रों पर टैरिफका खतरा—यह भारत की आर्थिक क्षमता को और भी पीछे धकेल सकताहै।
जनसांख्यिकीय लाभांश: कहीं हाथ से न निकल जाए सुनहरा मौका
भारत इस समय अपने जनसांख्यिकीय लाभांश (demographic dividend) के शिखर पर है—यह एक ऐसा दौर है जब काम करने वालीआबादी आश्रितों की तुलना में बहुत अधिक है। यह अवसर सीमित समयके लिए है और 2045 तक समाप्त हो जाएगा। चीन, जापान और अमेरिकाजैसे देश इसी अवसर का लाभ उठाकर विकसित हुए थे, लेकिन अब वेइस दौर से आगे निकल चुके हैं। भारत को इस क्षणिक अवसर को स्थायीसमृद्धि में बदलने के लिए तुरंत कदम उठाने होंगे, और इसका एकमात्ररास्ता महिलाओं को पूरी तरह से कार्यबल में शामिल करना है।
ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी में थोड़ी वृद्धि हुई है, लेकिन यहज़्यादातर अवैतनिक और पारिवारिक कार्यों तक सीमित है, जिसकीउत्पादकता कम है। दूसरी ओर, शहरी भारत में महिला श्रम बल भागीदारीस्थिर बनी हुई है। इसके अलावा, असुरक्षित सार्वजनिक परिवहन, स्वच्छता की कमी और अवैतनिक देखभाल कार्य का भारी बोझ महिलाओंको शिक्षा और रोजगार दोनों से दूर कर देता है। भारत को इटली औरग्रीस जैसे दक्षिणी यूरोपीय देशों के अनुभव से सबक लेना होगा, जहाँमहिलाओं की आर्थिक भागीदारी की कमी ने विकास पर लंबे समय तकनकारात्मक असर डाला। यह ‘अब या कभी नहीं’ का निर्णायक क्षण है।
महिलाओं की गतिशीलता और रोजगार: देश में ही छिपे हैं समाधान
इसके लिए हमें कहीं दूर देखने की आवश्यकता नहीं है। कर्नाटक की‘शक्ति‘ योजना, जो महिलाओं को मुफ्त सार्वजनिक बस यात्रा प्रदानकरती है, एक बेहतरीन उदाहरण है। 2023 में इसके लॉन्च के बाद से, महिला यात्रियों की संख्या में 40% से अधिक की वृद्धि हुई है। इस योजनाने महिलाओं की काम, शिक्षा और उद्यम के लिए गतिशीलता को बढ़ायाहै, खासकर ग्रामीण और अर्ध–शहरी क्षेत्रों में। शुरुआती अध्ययन बताते हैंकि इससे महिलाओं की नौकरी के बाजारों तक बेहतर पहुँच बनी है, पुरुषपरिवार के सदस्यों पर निर्भरता कम हुई है और उनकी स्वायत्तता बढ़ी है।
इसी तरह, राजस्थान की ‘इंदिरा गांधी शहरी रोजगार गारंटी योजना‘ ने 4 करोड़ से अधिक मानव–दिवस का काम सृजित किया है, जिसमें लगभग65% नौकरियाँ महिलाओं को मिली हैं। इस कार्यक्रम के तहत स्वच्छता, वृक्षारोपण और देखभाल जैसे लचीले और पड़ोस–आधारित कार्यों ने उनमहिलाओं को भी कार्यबल में प्रवेश करने में सक्षम बनाया है, जो पहलेघरेलू जिम्मेदारियों के कारण ऐसा नहीं कर पाती थीं।
‘गिग इकोनॉमी‘: महिलाओं के लिए सशक्तिकरण का नया मार्ग
‘अर्बन कंपनी‘ जैसे अग्रणी गिग प्लेटफॉर्म ने 45,000 से अधिक महिलासेवा प्रदाताओं को जोड़ा है, जो प्रतिमाह ₹18,000 से ₹25,000 तककमाती हैं। इन महिलाओं को दुर्घटना बीमा, मातृत्व लाभ और कौशलविकास जैसी सुविधाएँ भी मिलती हैं। इस प्लेटफॉर्म द्वारा सुरक्षा, प्रशिक्षण और पारदर्शी भुगतान पर दिया गया जोर यह दर्शाता है कि गिगकार्य मॉडल विशेष रूप से अर्ध–कुशल शहरी महिलाओं के लिएसशक्तिकरण का माध्यम बन सकता है।
ये उदाहरण स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि जब राज्य और निजी क्षेत्रगैर–पारंपरिक कार्यों को भी पहचान कर समर्थन देते हैं, तो वह बड़े पैमानेपर आर्थिक मूल्य को अनलॉक कर सकता है।
निष्कर्ष: महिला शक्ति से ही होगा भारत का कल्याण
भारत आज एक चौराहे पर खड़ा है। एक रास्ता अपनी महिलाओं में निवेशकरके समावेशी विकास हासिल करने का है। दूसरा रास्ता उन्हेंनजरअंदाज करके आर्थिक कमजोरी का है। ट्रंप का टैरिफ एक चेतावनीहै, लेकिन यह एक अवसर भी है—एक ऐसा अवसर जो हमें अपनीमहिलाओं की शक्ति को पहचानने के लिए मजबूर कर रहा है। चुनावस्पष्ट है: भारत का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अपनी आधीआबादी की क्षमता को कितनी गंभीरता से लेता है।
