March 7, 2026

इस गांव में चार सौ सालों से नहीं पैदा हुआ कोई बच्चा

राजगढ। शादी-ब्याह के बाद हर घर आंगन में बच्चे की किलकारी गूंजे यह हर किसी की ख्वाहिश होती है। संतान पैदा कर अपने वंश को बढ़ाना हर किसी का सपना होता है। संतान पैदा होने पर बधाई गीत गाए जाते हैं। खुशियां बांटी जाती है। लेकिन मध्यप्रदेश का एक गाँव ऐसा है जहां पिछले 4 सौ सालों से गाँव के भीतर बच्चा पैदा नहीं हुआ। ये कोई कहानी नहीं बल्कि हकीकत है।

राजगढ जिला मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर और राजधानी भोपाल से करीब 80 किलोमीटर दूर एक साका जागीर गाँव बसा है। गाँव की आबादी करीब डेढ हजार है। गुर्जर बाहुल्य इस गाँव में लोग शादी तो करते हैं लेकिन संतान पैदा करना इनके लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होती। इस गाँव के भीतर डिलिवरी नहीं होती। किसी ने जिद की तो उसका अंजाम ऐसा हुआ कि लोग गाँव के भीतर डिलिवरी कराने की बात भर से सिहर जाते हैं।

महिला के गर्भवती होते ही गाँव के पहले ही महिला को गाँव से बाहर किसी दूसरे गाँव या शहर भेज देते हैं। यहां मान्यता है कि गाँव की सरहद में यदि बच्चा पैदा हुआ तो उसकी मौत हो जाएगी या फिर बच्चा जीवनभर के लिए अपाहिज हो जाएगा। गाँव के सौरम सिंह दिव्यांग है। उनका पैर बचपन से ही काम नहीं करता है। सौरम सिंह कहते हैं कि उनके जन्म के वक्त माँ को बाहर ले जा रहे थे लेकिन ले जाते- ले जाते गाँव की सरहद में ही वो पैदा हो गए। इसी की वजह से वे जीवन भर चल नहीं पाते।

गाँव के भीतर डिलिवरी की बात सुनकर लोग बूरी तरह सहम जाते हैं। भारत सिंह गुर्जर की बहू को 6 महीने पहले ही बेटी पैदा हुई। भारत सिंह कहते हैं उन्होंने अपनी बहू कि डिलिवरी गाँव की काकड़ (सरहद) से दूर ले जाकर खुले आसमान तले करवाई। भारत सिंह से गाँव के भीतर डिलिवरी का सवाल किया तो उन्होंने सिरे से खारीज करते हुए कहा हो ही नहीं सकती। असंभव। ऐसा हुआ तो अनर्थ हो जाएगा।

डर के कारण गाँव के बाहर बनाया डिलिवरी रुम

गाँव में 400 सालों से यही मान्यता चली आ रही है। कोई भी गाँव के भीतर डिलिवरी नहीं करवाता। करीब 60 साल पहले गाँव की सीमा के बाहर सरकार ने भी इस मान्यता पर मुहर लगाते हुए एक डिलिवरी रुम बनवा दिया था। गाँव के कई बच्चे इसी कमरे में सालों तक जन्म लेते रहे। एक बार किसी महिला कि मौत हो गई। गाँव वालों ने उसका भूत मानकर यहां भी डिलिवरी कराना बंद कर दिया। धीरे-धीरे यह खंडहर में तब्दिल हो गया। कुछ लोग गर्भवती होने पर महिला को नजदीकी अस्पताल या फिर दूसरे गाँव ही छोड आते हैं लेकिन ज्यादातर लोग आज भी इसी जर्जर डिलवरी भवन के पास खुले मैदान में तिरपाल की आड में डिलिवरी कराते हैं।

इस कारण नहीं होती डिलिवरी

साका जागीर गाँव का दूसरा नाम साका श्यामजी भी है। यहां 16 वीं शताब्दी का पत्थरों से बना बहुत बडा मंदिर है। इसी मंदिर की पवित्रता के लिए गाँव में डिलिवरी नहीं की जाती। दूसरी मान्यता यह भी है कि इस गाँव में जब 400 साल पहले यह मंदिर देवताओं ने बनाया था। सुबह होने से पहले मंदिर बनाना था। इसी बीच अल सुबह किसी महिला ने अनाज पिसने की घट्टी चला दी जिससे मंदिर निर्माण अधूरा रह गया। तभी यहां कि महिलाओं को श्राप दिया गया कि अब यहां कोई भी महिला अपनी संतान को जन्म नहीं दे पाएगी।

सरकार ने अंधविश्वास दूर करने के नहीं किए प्रयास

साका श्यामजी गाँव में पीढियों से चली आ रहे इस अंधविश्वास को खत्म करने के लिए सरकार ने कभी कोई कोशिश नहीं की बल्कि सरकार ने सालों पहले खुद ही गाँव की सीमा के बाहर डिलिवरी रुम बना कर गाँव वालों के इस अंधविश्वास पर मुहर लग दी। गाँव में इस अभिशाप की वजह से महिलाओं के खुले आसमान तल रात का अंधेरा हो या दिन का उजाला अपनी प्रसव पीड़ा के साथ यह परेशानी भी झेलना पडती है। इसमें हाइजीन नहीं होने के कारण असुरक्षित प्रसव से महिला की जान जोखिम में पड़ जाती है।

Written by XT Correspondent

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