March 7, 2026

प्राचीन शिक्षा पद्धति की प्रासंगिकता।

लेखिका डॉ. अनन्या मिश्र, आईआईएम इंदौर में मेनेजर  कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन एवं मीडिया रिलेशन के पद पर हैं। 

 

एक्सपोज़ टुडे।

प्राचीन भारत में शिक्षकों, विद्यार्थियों और शैक्षणिक संस्थाओं – तीनों ने मिलकर सामूहिक और व्यक्तिगत रूप से अनेक ऐसे कार्य किए और परंपराएँ स्थापित कीं जिनकी प्रासंगकिता चिरकालीन है कठोपनिषद में वर्णन है कि आध्यात्मिकता ने भौतिकता पर विजय प्राप्त की आधुनिक युग में जिस प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में तेज़ी से व्यावसायिकता विकसित हो रही है, उस वातावरण में कठोपनिषद ने इस आदर्श की प्रासंगिकता से इंकार नहीं किया जा सकता

सामान्यतः पश्चिमी चिंतन से प्रभावित शिक्षाविदों और विचारकों ने यह मत बार-बार प्रस्तुत किया है कि प्राचीन शिक्षा केवल कर्मकांडों पर आधारित थी, तप, कर्मकाण्ड और पवित्रता से सम्बंधित अनेक नियम प्रचिलित थे, लेकिन इस सम्पूर्ण प्रणाली की व्यवस्था इस प्रकार थी कि विद्यार्थी का दृष्टिकोण विस्तृत हो जाए, विद्यार्थी के  मन में प्रकाश जागे,उसकी बुद्धि प्रखर हो जाए और उसका व्यक्तित्व ऐसा विकसित हो कि उसका चारित्रिक बल बढे यह आधुनिक समाज की भी मांग है कि युवा सचरित्र, सुशिक्षित और संस्कारों से युक्त हो

एक ओर जहाँ प्राचीन शिक्षा पद्धति में आध्यात्मिक ज्ञान के अभाव को ‘अज्ञान कहा गया है, वहीं आज किसी विशेष जानकारी के अभाव को ‘अज्ञान माना जाता है जानकारी या सूचना तो आज कंप्यूटर के एक क्लिक पर उपलब्ध है इस सूचना के प्रयोग से अगर मानवीय कल्याण के लिए प्रयत्न नहीं किए जाते, तो शिक्षा का ध्येय पूरा नहीं हो सकेगा आज विघटन भी  एक बड़ी सामाजिक समस्या है इसे दूर करने के लिए राजनीतिक स्तर पर अनेक प्रयत्न किए जाते हैं प्राचीन भारत की शिक्षा पद्धति में इस शिक्षा ब्रह्म की सर्वव्यापकता के सिद्धांत पर आधारित थीइसमें सृष्टि के समस्त तत्वों में एकात्म स्थापित करने और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के अनुरूप आचरण करने का संस्कार विकसित किया गया था आज स्कूल चलो अभियान, सर्व शिक्षा अभियान, शिक्षा का अधिकार जैसे अनेक प्रयोग शासकीय स्तर पर संचालित किए जाते हैं लेकिन फिरभी भारत की एक-तिहाई जनसंख्या आज निरक्षर है निस्संदेह इन प्रयासों से शिक्षा के विकास में बहुत सहायता मिली है, किन्तु मंजिल अभी दूर है

आधुनिक विश्व में भू-मंडलीकरण और वैश्वीकरण जैसे शब्दों का प्रयोग होने लगा है, लेकिन भारत ने अपनी प्राचीन शिक्षा पद्धति में सम्पूर्ण विश्व को एक घोंसले के रूप में प्रस्तुत किया और उस आदर्श का प्रचार किया कि ‘यत्र विश्व भवत्येकनीडम’ शिक्षा के क्षेत्र का यह सार्वभौमिक विचार और लोक मंगल की भावना सभी विद्यार्थियों में प्रेम-सहानुभूति, त्याग,सहनशीलता और विचारशीलता के गुण भर देने के लिए अभिप्रेरित हैंवर्तमान समय में जहां आसुरी शक्तियां आतंकवाद के विद्यालय और प्रशिक्षण केंद्र चला रही है, ऐसी स्थिति में गुरुकुलों, आश्रमों और शिक्षण संस्थानों से लोकमंगल करने वाले विद्यार्थियों का सृजन सदैव प्रासंगिक रहेगा

प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति निश्चित रूप से उन सिद्धांतों को अपना मूल आधार मानती थी जो आज भी सर्व स्वीकृत है विश्व के विभिन्न देशों में इन्हीं शैक्षणिक आदर्शों को अलग-अलग नामों से अपना लिया गया हैशिक्षा के सामान्य सिद्धांतों में बौद्धिक स्वतंत्रता को आज चॉइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम कहा जाता है विद्यार्थी की व्यक्तिगत रूप से देख रेख को मेंटर सिस्टम और बालचर प्रणाली को मॉनिटर सिस्टम का नाम दे दिया गया है प्राचीन काल में गुरु-पालक शिष्य संबंधों का उल्लेख मिलता है जिसे आधुनिक युग में पेरेंट्स-टीचर-स्टूडेंट-एसोसिएशन बना दिया गया है उन्नत विचार शिक्षा इनोवेटिव प्रैक्टिस हो गयी है और लोक-शिक्षण पद्धति ओपन स्कूल और ओपन यूनिवर्सिटी हैं पूर्व छात्रों का गुरुकुल लौट कर आना और विद्यार्थियों से चर्चा करना एलुमनाई मीट बन चूका है

इन सभी कथनों से स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति के अधिकांश आदर्श आज भी प्रासंगिक हैं भले ही समाज और सरकार उन्हें प्राचीन शिक्षा प्रणाली से भिन्न माने और परिवर्तित नामों का उपयोग करें,लेकिन उनकी प्रासंगिकता से इंकार नहीं किया जा सकता आवश्यकता केवल इतनी सी है कि ज्ञान के इस असीम भंडार को उचित संशोधन और परिमार्जन के साथ शिक्षानिक और सामाजिक विकास के महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में प्रयोग में लाया जाए

Written by XT Correspondent

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