March 7, 2026

सब्ज़ी वाले की मगन उंगलियों ने पेंटिंग दिखाना शुरू किया। और हम अवाक्। वह बोला “कला! बेचते नहीं थे, परोसते थे। चित्र बनाते थे आदिवासी शैली के।”

लेखक अगम जैन आईपीएस हैं और मध्यप्रदेश के राज्यपाल के परिसहाय ( एडिसी टू गवर्नर) हैं। 

एक्सपोज़ टुडे। 

जैसे ही बारिश थोड़ी धीमी हुई, हम भुट्टे खरीदने निकल गए। अलसाया हुआ मौसम और घर पर बनी भुट्टे की पकौड़ी के संबंध का क्या कहना– लाजवाब।

भुट्टों की छानबीन करते हुए हम एक ठेले पर ठिठके। देखने में तो भुट्टे बढ़िया लग रहे थे लेकिन पुरानी शंका की बीमारी से ग्रस्त होने के कारण हमने सब्जी वाले भैया से पूछा कि वे भुट्टे कड़क तो नहीं निकलेंगे? लेकिन उसके ‘हां’ कहने की कितनी संभावना थी? क्या यह भी कभी हुआ है कि सब्जी वाला ग्राहक के स्वर में ही गाने लगे कि पालक तो रंग छोड़ रही है, भिंडी में इल्लियां हो गई हैं, लौकी जो आप ने उठाई है वह गदा से कम नहीं है, सर पर मारकर देख सकते हैं।

 वही हुआ। भैया ने कहा कि आप खाकर तो देखिए। अच्छा ना लगे तो वापस कर देना। अब इसकी भी कितनी संभावना थी? कहां कोई मनमाफिक सब्जी ना मिलने पर शोधी हुई सब्जी लेकर फिर सब्जीवाले के पास पहुंचता है। यह सब तो दूर की बहन की विदाई में रोने जैसी औपचारिकताएं हैं जो सदियों से निभाई जा रही हैं।

 हमने एक किलो भुट्टे बांधने पर मुहर लगा दी। भैया ने तौलना शुरू किया ही था कि हमारे चंचल मन ने फिर सावधान किया।

“भैया, देखना। अच्छे वाले देना।”

भैया ने इस बार अनसुना कर दिया। करना ही पड़ता है। हम अनर्गल प्रलाप जो किए जा रहे थे।

 पर हम भी उसके धैर्य की परीक्षा लिए जा रहे थे। थैले में डालते वक्त एक बार और छेड़ा।

“भैया अच्छे नहीं निकले तो फिर कभी नहीं आएंगे यहां।”

उसका सब्र अब तक पच गया था। उसने थैली में से एक भुट्टा निकाला और गुस्से में छील दिया। आंखों से ही नाराजगी जाहिर कर दी। हम भी अपनी बेवकूफी पर तौबा कर गए।

 जब वह थोड़ा ठंडा हुआ तब उसने बताया कि सब्जी बेचना उसका पेशा नहीं है। पेशेवर दाव पेंच उसको नहीं आते।

 “कम कमाएंगे लेकिन चीज गलत नहीं देंगे भैया।”

जीवन में कौतूहल का पेट कभी भरा है क्या! हमारे भूखे कौतूहल ने पूछा कि सब्जी नहीं तो फिर क्या बेचते थे?

“कला! बेचते नहीं थे, परोसते थे। चित्र बनाते थे आदिवासी शैली के।”

पर फिर कोरोना सब पर भारी पड़ गया। ब्रश की जगह हाथ में सब्जी आ गई और कैनवास की जगह ठेला।

हम भी सोच में कि दिन के फेर तो देखो। लेकिन उसकी आंखें कला का नाम सुनकर मानो चौड़ी हो गई हों।

 पूछने लगे कि क्या हम कुछ चित्र देखेंगे?

 हमारी गर्दन ‘हां’ के लिए पूरी तरह हिल भी नहीं पाई थी कि उसने जेब में से थैली में लिपटा मोबाइल निकाल लिया। दूसरा ग्राहक ठेले पर आ गया था लेकिन उसकी ऊर्जा की व्युत्पत्ति सब्जियों से कहां थी!

 मस्त मगन उंगलियों ने पेंटिंग दिखाना शुरू किया। और हम अवाक्। उच्चस्तरीय कला! जैसे कि बड़े-बड़े कला भवनों में या कि संग्रहालयों में या की बंगलों के मुख्य कक्षों में होती है।

 हमारे करुणा मिश्रित आश्चर्य को वह भांप गया। उसने सांत्वना देते हुए बताया कि कुछ प्रोजेक्ट शायद फिर मिलेंगे। सब्जी पर पानी मारने की जगह रंगों में पानी भरने के दिन शायद वापस आ जाए।

 हम असहाय, भुट्टे–भुट्टे पर लड़ने वाले घर वापस लौट आए। और छोड़ आए उसकी आंखों में तरकारियों के रंग घुलते हुए। टमाटर, खीरा,भुट्टे और कद्दू के रंग से छिटककर कैनवास पर बिखरते हुए।

Written by XT Correspondent

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