April 27, 2026

इंदौर आते वक्त मैं भी ट्रैफ़िक जाम मे फँसा। और तब मैने जाना हमारे उपनिषद सच्चे हैं।

लेखक मुकेश नेमा मध्यप्रदेश आबकारी विभाग में स्टेट फ्लाइंग स्क्वाड प्रभारी हैं।

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आप पैदा होने के बाद तभी तक सुखी रह पाते हैं जब तक चलना शुरू न कर दें। एक बार चले आप तो फिर ज़िंदगी भर चलते ही रहते है।चलना दौड़ने में बदलता है फिर। कोई आगे न निकल जाए इसकी फ़िक्र। कोई पीछे से ठोक न जाए इसकी चिंता। आप यही करते है हर रोज और इसके अलावा और कुछ कर नही पाते।फिर उत्तरार्ध आता है जीवन का। आप सुस्ताते है। सुस्ताते हुए ही सोच पाता है आदमी कि हम कहाँ से आए थे ? कहाँ जाना है ? मैं कौन हूँ ? क्या करने के लिए पैदा हुआ था और क्या कर रहा हूँ ? और जब आप इस तरह सोचने लगते है तो अध्यात्म को उपलब्ध हो जाते है। और ऐसा तभी मुमकिन है जब आप किसी ट्रैफ़िक जाम मे फँस जाए।

इंदौर आते वक्त मैं भी ट्रैफ़िक जाम मे फँसा। और तब मैने जाना हमारे उपनिषद सच्चे हैं। हमारे उपनिषदो मे कहा गया है कि ,आत्मानं विद्धि” अपने आप को जानो। जीवन की भागदौड़ से परे जाकर आत्म-साक्षात्कार ही मुक्ति का मार्ग है। ट्रैफ़िक जाम में फँसते ही भागदौड़ समाप्त हो जाती है। बहुतो की आत्मा जाग जाती है। और बहुत से समाधि मे चले जाते हैं। पतंजलि के योगसूत्रों में दौड़-भाग को मन की चंचलता का नतीजा माना गया है। मन शांत होता है समाधि लगने से। और ट्रेफ़िक जाम समाधि की अवस्था तक पहुँचने का सबसे सुलभ और सस्ता तरीका है।
ट्रैफ़िक जाम आपको आत्म संयम का पाठ पढ़ाता है। टूटी सड़कें। सैकड़ों हज़ारों आड़ी तिरछी लुच्ची कारें। छाती पर चढ़े बदमाश किस्म के ट्रक। पांव रखने और साँस लेने की रत्ती भर भी गुंजाइश नही। ऐसे मे आप चीख चिल्ला कर भी क्या हासिल कर लेंगे ? और तब आपकी आत्मा या कोई पुलिस कांस्टेबल आपको बताता है कि जीवन की ये सारी भागदौड़ व्यर्थ है ।खुद को जानना सबसे अधिक जरूरी है ,और आप ये सत्य जान सके इसके लिए ट्रैफ़िक जाम जैसे आयोजन किए जाते हैं।
भागदौड़ ही दुख का कारण। ट्रेफ़िक जाम हमे दुखों से मुक्त करता है। ट्रैफ़िक जाम तपाते है आपको। आप खुद तो मारपीट करने से बमुश्किल रोक पाते हैं। ट्रेफ़िक जाम में फँसे बिना तक तप और अहिंसा जैसे शब्दों का अर्थ समझना मुश्किल है। ट्रैफिक जाम मे फंस कर ही आप जान पाते है कि नियति सर्वोपरि है। आप भगवान भरोसे हैं। संसार क्षणभंगुर है और सच्चा सुख और शांति बाहरी दौड़ में नहीं, बल्कि आत्म-जागरूकता, संयम और आध्यात्मिक चेतना में है।
ट्रेफ़िक जाम में फँसकर आप जान पाते है कि हमारे नागरिकों की लोकतांत्रिक चेतना कितनी प्रखर है और वो अपनी सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों से कितना प्रेम करते है। आप ऐसी गालियाँ सुनकर चकित होते है जो आपने पहले कभी नही सुनी थी। अपने शब्दकोश में वृद्धि होने को मैं ट्रैफ़िक जाम में फंसने की उपलब्धियों में शामिल करता हूँ।
आपकी जानकारी के लिए बुद्धत्व को प्राप्त हो चुका मैं। इसके लिए न बोधिवृक्ष की जरूरत पड़ी मुझे न खीर लेकर आने वाली सुजाता की। ज्ञान से लबालब हूँ अब मैं। और इसके लिए भोपाल इंदौर सड़क और इस पर लगे ट्रैफ़िक जाम का आभारी हूँ।
मुकेश नेमा
Written by XT Correspondent

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