जबलपुर। मध्यप्रदेश के जबलपुर में सफेद दूध के व्यापार का घिनौना काला सच सामने आया है। यहां कुछ डेयरी संचालक सिर्फ कुछ पैसों के लालच में भैंस के बच्चों को तड़प-तड़प कर मरने को छोड़ रहे हैं। ताकि भैंस के बच्चों द्वारा पीया जाने वाला दूध बच जाए और उसे बेचकर पैसा कमाया जा सके।
दरअसल जबलपुर के पनागर व परियट क्षेत्र में कई भैंस के बच्चे रोजाना तड़प-तड़प कर मरने पर मजबूर है। डेयरी संचालक दूध के लालच में भैंस के नर बच्चों को भैंस के पास भी नहीं भटकने देते हैं। ऐसे में मां का दूध नहीं मिलने से भैंस का बच्चा या तो भूख से मर जाता है या फिर रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण बिमारियों का शिकार हो जाते हैं।
बता दे कि जबलपुर के परियट इलाके में ही लगभग 200 डेयरी का संचालन होता है। इनमें से कई डेयरी संचालक दूध बचाने के लिए भैंस के बच्चों को मौत के मुंह में धकेल रहे हैं। हालांकि डेयरी संचालकों का कहना है कि भैंसों के बच्चों में मृत्युदर अधिक होने के कारण उनकी जान बचा पाना मुश्किल है। लेकिन यहां भी सवाल यह खड़ा हो रहा है कि इलाके में भैंस के नर बच्चों की ही क्यों मौत हो रही है? शायद इसलिए कि मादा बच्चे बड़ी होकर आय का जरिया बनेगी।
डेयरी संचालकों के इस रवैये के कारण इलाके में नाले में दुर्गंध और प्रदूषण हो गया है। नाले में हड्डियां और मांस के लोथड़े भी नजर आते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि डेयरी संचालक मरे हुए बछड़ों को नाले में फेंक देते हैं, जो आगे जाकर नदी में मिलता है। नदी का पूरा पानी विषैला हो गया है।
स्थानीय नागरिकों ने बताया कि हर नवजात बछड़ा एक बार में करीब एक से दो लीटर तक दूध पी जाता है। इस दूध को बचाने के लिए कुछ डेयरी संचालक इतना घिनौना काम करते हैं। संचालक मशीनों की मदद से दूध की दोहनी करते हैं।
