May 3, 2026

54 सालों से आदिवासियों की फसल का पहला भुट्टा मामाजी के नाम

इंदौर। मध्यप्रदेश, राजस्थान और गुजरात के करीब आठ जिलों में रहने वाले आदिवासियों के खेतों में जब पहला फल मक्का का भुट्टा पकता है तो वे इसे मामाजी की समाधि पर चढ़ाने आते हैं। भीलों के संत कहे जाने वाले मामा बालेश्वरदयाल की पुण्यतिथि पर यहाँ हर साल हजारों आदिवासी उमड़ते हैं। इक्कीस साल पहले मामाजी नहीं रहे लेकिन यह परम्परा उनके जीवित होने के समय से अब तक लगातार 54 सालों से चली आ रही है।

इस साल भी हजारों आदिवासियों ने बामनिया पहुँचकर मामाजी की पुण्यतिथि पर अपने खेत का पहला भुट्टा चढाते हुए उन्हें याद किया। गौरतलब है कि मामाजी ने अंग्रेजों के साथ-साथ भील बाहुल्य इस क्षेत्र की स्थानीय रियासतों के खिलाफ बड़ा आन्दोलन खड़ा किया और आदिवासियों को राजा की बेगार, जागीरी, अकाल के दौरान भी कर वसूली आदि से मुक्ति दिलाई। देश को आजादी भले ही गांधी जी और बाकी सेनानियों ने दिलाई पर इन आदिवासियों को तो सच्चे अर्थों में राजा और उसके कामदारों की तानाशाही से आज़ादी मामाजी के प्रयासों से ही मिली। यहाँ के गाँव-गाँव में मामाजी की प्रतिमाएँ लगी हुई हैं और वे इन्हें भगवान की तरह पूजते हैं।

समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक डॉ सुनीलम ने भी उनकी समाधि पर श्रद्धांजलि देते हुए बताया कि उन्होंने मेघनगर में विधायक बीर सिंह से मामाजी की प्रतिमा झाबुआ कलेक्टर परिसर में लगवाने की अपील की। झाबुआ और अलीराजपुर के विधायक इस मांग को लेकर मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपेंगे। इस बार मामा जी के अनुयायी मामाजी स्मृति यात्रा निकालेंगे। मामा जी को भारत रत्न देने, बामनिया रेलवे स्टेशन का नाम मामा बालेश्वर दयाल करने, स्कूलों के पाठ्यक्रम में उनका जीवन परिचय शामिल करने की मांग का ज्ञापन भी मुख्यमंत्री को सौंपा जाएगा।

डॉ सुनीलम ने कहा कि देश में मामा बालेश्वर दयाल अकेले ऐसे नेता हैं जिनकी डेढ़ सौ से अधिक प्रतिमाएँ आदिवासियों ने अपने गांव में लगाई हैं। हर वर्ष पहली फसल का पहला फल लेकर समाधि पर चढ़ावा चढ़ाने हज़ारों आदिवासी बामनिया पहुंचते हैं।

श्रद्धांजलि सभा को वरिष्ठ पत्रकार क्रांति कुमार वैद्य, पत्रकार सत्यनारायण शर्मा, सपा नेता राजेश बैरागी, नरेंद्र मुनिया, सरपंच पिडया निनामा, गोपाल डामोर ने भी सम्बोधित किया। समाधि स्थल पर राजस्थान के बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ से हज़ारों अनुयायी पूंजा भगत, कांति भगत, रत्ना भगत, गौतम भगत, नानका भगत, राकमा भगत, नाथू महाराज, रूपा बाई, कैलाश भगत, डूंगर सिंह बापू, सुशीला बहन और आदिवासी नरेश के नेतृत्व में पहुंचे। पूंजाभगत ने बताया कि मामा जी के जीवन काल से ही यह परंपरा 1965 से शुरू हुई थी जो उनके देहांत के बाद 54 वर्षों बाद अब भी चल रही है।

कौन थे मामाजी?

भीलों के गांधी कहे जाने वाले मामा बालेश्वर दयाल 1931 में प्रसिद्ध क्रन्तिकारी चंद्रशेखर आजाद की मृत्यु के बाद उनकी माँ से मिलने झाबुआ जिले के भाभरा आए थे। वहाँ उनकी मुलाकात आजाद के बचपन के साथी भीमा से हुई. 1932 में उन्हें झाबुआ जिले के थांदला के एक स्कूल में हेड मास्टर की नौकरी मिली और वहीं के हो गए. धीरे-धीरे भीलों के बीच भी घुल मिल गए.

वे यहाँ आदिवासी समाज के शोषण को देखकर इतने दुखी हुए कि उन्होंने भाभरा में रहकर ही आदिवासियों के लिए काम करने का निर्णय ले लिया। उस समय थांदला, झाबुआ रियासत में आता था। एक बार राजा की बेगार करते हुए एक भील महिला की मृत्यु हो गई। उसकी अर्जी लिखने के जुर्म में मामाजी को डेढ़ महीने की जेल में गुजारना पड़े, लेकिन अर्जियाँ लिखना बंद नहीं हुआ। अर्जियाँ लिखने के जुर्म में ही वे दो-तीन बार जेल भेजे गए. 1939 में मामाजी बामनिया आ गए जो अंत तक उनका निवास और आंदोलनों का केंद्र रहा। बामनिया में एक डूंगर विद्यापीठ नामक स्कूल शुरू किया। जिसमें आदिवासी बच्चों को साथ में रखकर पढ़ाना शुरू किया। झाबुआ, धार, रतलाम, बांसवाड़ा, डूंगरपुर आदि जिलों में भी स्कूल खोले। स्थानीय भील तत्कालीन राजाओं की बेगार से बहुत त्रस्त थे। राजा उच्च जाति के लोगों की बेगार माफ होने से सारा काम इन्हीं से कराते थे।

मामाजी ने पुरी के शंकराचार्य से मिलकर आदिवासियों को जनेऊ पहनाने की अनुमति ले ली। शंकराचार्य ने ‘दारू मांस छोड़ों और जनेऊ पहनो’ का नारा दिया। मामाजी ने इंदौर के कृष्णकांत व्यास से कहकर इसके 3 लाख परचे छपवाए। यह खबर इलाके में फैली और हजारों की संख्या में आदिवासी दूर-दूर से बामनिया आने लगे। जनेऊ पहन कर आदिवासियों की राजा की बेगार बंद हो गई। धीरे-धीरे आसपास की बारह रियासतों में आंदोलन फैल गया। इसके बाद वे दाहोद में रहने लगे। यहाँ से उन्होने जागीरी प्रथा और बेगार के खिलाफ जोरदार आंदोलन छेड़ा। कश्मीर में हुई देशी राज्य परिषद में नेहरू नें मामाजी को बुलाया तो उन्होंने जागीरी और बेगारी के कारण आदिवासियों की बर्बादी की कहानी नेहरू को सुनाई। नेहरू नें भरोसा दिया कि स्वतंत्रता की पहली किरण के साथ ही जागीरें खत्म की जाएंगी, लेकिन देश आजाद होने के बाद सारे जागीरदार कांग्रेस में शामिल हो गए और जागीरें खत्म करने की बात को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

मामाजी ने कई बार नेहरू को याद दिलाया, पर कुछ न होता देख उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा देकर जागीरदारों को लगान न देने का आंदोलन छेड़ दिया। इसमें बड़ी संख्या में आदिवासी उमड़ पड़े। 6 महीनों तक यह सिलसिला चला। 1949 में उदयपुर से लौटते समय उन्हें रेल रोक कर गिरफ्तार कर लिया गया। लगभग साढ़े आठ महीने टोंक जेल में रखा गया। बाहर लोगों का आंदोलन जोर पर था। आजादी के बाद भी एक स्वतंत्रता सेनानी जेल में था। यह बात भारत के प्रथम गवर्नर जनरल राजागोपालचारी तक पहुंची तो उन्होंने इस क्षेत्र की रियासतों को खारिज करने का आदेश जारी कर मामाजी को रिहा करवा दिया। इसके बाद समाजवादी पार्टी के जयप्रकाश नारायण ने बामनिया आकर बैठक की जिससे क्षेत्र में इस पार्टी का प्रचार हो गया और लोगों नें इसकी निशानी स्वरूप लाल टोपी पहननी शुरू कर दी।

आदिवासियों में आई इस जन जागृति को उन्होंने मुख्यधारा की राजनीति से जोड़ा। आजादी के बाद के पहले आम चुनावों में इस पूरे क्षेत्र में मामाजी से जुड़े आदिवासी कार्यकर्ता विधायक और सांसद चुने गए. 1952 के पहले मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में झाबुआ की पांचों सीटों से समाजवादी कार्यकर्ता जीते। इनमें जमुना देवी भी थीं जो बाद में उपमुख्यमंत्री भी बनीं।

उन्होंने अकाल के समय जबरन कर वसूली के विरोध के साथ राजाओं व कर्मचारियों की दमनकारी नीतियों का विरोध किया। उन्होंने सामाजिक मुद्दों पर भी काम किया। भीलों में नशाबंदी का लंबा आंदोलन चला। शराब पीने में कमी से राजा की शराब ठेकों से आमदनी बहुत कम हो गई. इससे राजाओं और पादरियों ने मिलकर मामाजी की शिकायतें की तो 1942 में महू के रेसीडेंट ने उन्हें इस क्षेत्र की नौ रियासतों से देश निकाला करने का आदेश दे दिया। कुछ दिन मामाजी को इंदौर की छावनी जेल में रखा गया। लेकिन बाद में उन्हें छोड़ दिया गया।

1962 में लोहिया के कहने पर मामाजी को समाजवादी पार्टी का अध्यक्ष बना दिया गया। आपातकाल के दौरान जेल गए और 1978 में राज्यसभा सदस्य बने। अपने जीवन में मामाजी नें सामाजिक सरोकार के मुद्दों से जुड़े सैकड़ों आंदोलन किए. जिस तरह गांधी, स्वतंत्रता आंदोलन के लिए पहचाने जाते हैं, उसी तरह भीलों के लिए राजाओं और कर्मचारियों की तानाशाही से आजादी इस लाल टोपी वाले गांधी मामाजी ने ही दिलाई. 26 दिसम्बर 1998 को मामाजी चल बसे।

Written by XT Correspondent

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