लेखिका डॉ अर्चना शुक्ला
शिक्षक (मध्यप्रदेश शिक्षा विभाग)
पक्षीविशेषज्ञ ( Ornithologist)
पक्षीविज्ञान में पीएचडी है।
Xpose Today News
गौरैया (हाउस स्पैरो) सदियों से मनुष्यों की साथी रही है। लगभग 5,000 वर्ष पहले जब मनुष्य ने स्थायी बस्तियाँ बसाईं, तब यह पक्षी जंगलों से निकलकर मानव बस्तियों के आसपास रहने लगी। पुराने घरों के रोशनदान, छज्जे, दीवारों की दरारें और खुले आँगन इसके सुरक्षित घोंसले हुआ करते थे। गौरैया केवल एक छोटी-सी चिड़िया नहीं, बल्कि पर्यावरण की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यह अपने बच्चों को पालने के लिए बड़ी मात्रा में कीटों और उनके लार्वा को खिलाती है, जिससे प्राकृतिक रूप से कीट नियंत्रण होता है और पर्यावरण का संतुलन बना रहता है।
समय के साथ आधुनिक वास्तुकला ने गौरैया के प्राकृतिक आवास समाप्त कर दिए। आज के कंक्रीट के बंद मकानों में न रोशनदान हैं, न दीवारों की दरारें और न ही घोंसला बनाने के लिए सुरक्षित स्थान। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार गौरैया की घटती संख्या का प्रमुख कारण मोबाइल टावर नहीं, बल्कि घोंसला बनाने के स्थानों का अभाव है।
इसी समस्या के समाधान के लिए विज्ञान शिक्षिका डॉ. अर्चना शुक्ला ने अपने विद्यार्थियों को प्रेरित किया और उनका मार्गदर्शन किया। यह अभियान मध्यप्रदेश के शासकीय उत्कृष्ट उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, वेन्कट क्रमांक-1, सतना से प्रोजेक्ट-आधारित शिक्षण (Project-Based Learning) के माध्यम से प्रारंभ हुआ। विद्यार्थियों ने पहले वैज्ञानिक शोध किया, फिर विभिन्न प्रकार के स्पैरो हाउस बनाकर उनका परीक्षण किया और कई वर्षों के निरंतर अध्ययन एवं सुधार के बाद वैज्ञानिक रूप से उपयुक्त मॉडल विकसित किए।
आज यह अभियान शासकीय सांदीपनि महात्मा गांधी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, भेल, भोपाल के विद्यार्थियों द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है। अब तक लगभग 5,112 स्पैरो हाउस स्थापित एवं वितरित किए जा चुके हैं, जिनमें बड़ी संख्या में गौरैयाओं ने सफलतापूर्वक घोंसले बनाए हैं।मध्यप्रदेश के एक छोटे से जिले सतना से शुरू हुआ यह छात्र-नेतृत्व वाला संरक्षण अभियान आज राष्ट्रीय सीमाओं को पार कर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक अपनी पहचान बना चुका है। यह पहल सिद्ध करती है कि जब शिक्षक विद्यार्थियों को वैज्ञानिक सोच, संवेदनशीलता और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव देते हैं, तब कक्षा में शुरू हुआ एक छोटा-सा प्रयास भी वैश्विक स्तर पर प्रेरणा बन सकता है।

