मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के जन्मदिन पर वरिष्ठ पत्रकार डॉ संतोष मानव की मुख्यमंत्री जी पर लिखी पुस्तक एमपी के नेताजी के कुछ महत्वपूर्ण अंश
डॉ संतोष मानव।
उस दिन गाड़ी बड़नगर चली जाती तो ?
इस शहर में नया क्या है? क्या है खास? उज्जैन, उज्जयिनी यही नाम है इस शहर का। क्या यह शहर भी वैसा ही है, जैसा हिंदुस्तान के दूसरे शहर होते हैं? क्या सब कुछ वैसा ही है?? टपरी वाली चाय की दुकान पर झालर की तरह लटके नमकीन के पैकेट्स। बेस्वाद – सी चाय। ट्रैफिक की रेलमपेल। यह सब तो है पर कुछ अलग भी है। यह धार्मिक नगरी है। एक प्राचीन शहर। धर्मग्रंथों और इतिहास की किताबों में जिस शहर का नाम है- यह उज्जैन है, यह अवंतिका है। यह महाकाल का शहर है- काल उसका क्या बिगाड़े, जो भक्त हैं महाकाल का। ट्रकों के पीछे आप यह पढ़ सकते हैं। पढ़ भी चुके होंगे शायद। शिव ही हैं महाकाल। और जो ट्रकों के पीछे लिखा होता है, वह शिव की महिमा का बखान है। यह शिव की महिमा ही है कि देश -विदेश से भक्त खींचे चले आते हैं उज्जैन – शिव की नगरी उज्जयिनी!
यह महान सम्राट विक्रमादित्य का भी उज्जैन है। लगभग आठ लाख की आबादी वाले शहर में अनेक इलाके हैं, जैसा दूसरे शहरों में होता है। गंज, नगर — सब मिल जाएंगे। उज्जैन नगर निगम में 54 वार्ड हैं। जल्द ही साठ हो जाएंगे। एक फैलता – बढ़ता शहर। शहर में है फव्वारा, फ्रीगंज, देवास रोड जैसे इलाके हैं तो शहर में एक नगर सेठी नगर भी है। फव्वारा जैसा रेलमपेल सेठी नगर में नहीं है। चौड़ी और साफ- सुथरी सड़क।
व्यस्ततम इलाकों में एक है फ्रीगंज। इसी फ्रीगंज के एक घर में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव का जनसंपर्क कार्यालय है। पता लगा, वे पहले इसी घर में रहते थे। अब इसे जनसंपर्क कार्यालय बना दिया गया है। यहां वैसी ही भीड़ होती है, जैसा अमूमन नेताओं के कार्यालयों में होती है। फेवर चाहने वाले लोग। अनुरोध करते लोग- बहुत दूर से रिश्तेदार आ रहे हैं। लेकिन, एक बड़ा फर्क था- फेवर चाहने वालों में अधिकतर की अर्जी इस बात के लिए कि किसी तरह बाबा महाकाल के दर्शन की वीआईपी व्यवस्था हो जाए। मुख्यमंत्री के कार्यालय से चाह भी तो भगवान की !!! कार्यालय सिस्टम से चल रहा-जूते बाहर उतार दीजिए, जो भी कहना हो, लिखित में ले आइए। पत्रकार हैं तो अलग बात है। कार्यालय की मानीटरिंग मुख्यमंत्री के बड़े भाई नंदलाल यादव करते हैं। पुराने सहयोगी सुरेंद्र यादव हर आगंतुक को पूरा समय देते हैं। परिस्थिति और मांग के अनुसार खुद निपट लेते हैं या नंदलाल यादव की ओर रेफर कर देते हैं – बड़े भईया से बात कर लीजिए।
शहर फैल रहा है। ट्रैफिक की समस्या बढ़ रही है। पर शहर है साफ- सुथरा। गलती से फव्वारा चौक गए तो गाड़ी फंस जाएगी। पुराने जमाने का हाथठेला दिख जाएगा। गाड़ी के पीछे गाड़ी खड़ी कर लोग चल देंगे। आप फंस जाएंगे। इंतजार कीजिए पीछे लगी गाड़ी के सवार के लौटने का। आपकी दिक्कत कौन समझेगा?? कोई नहीं । कोई चारा नहीं। चुपचाप गाड़ी में पड़े रहिए। सांदीपनि आश्रम जाइए, तो जूता-चप्पल की हिफाजत खुद कीजिए। संभव है, लौटने पर जूता नहीं मिले। मंदिरों के इस शहर में मंदिर -मंदिर घूमिए। आप थक जाएंगे। फिर भी कुछ मंदिर अनदेखा रह जाएगा। कहां -कहां जाएंगे। हर चौक – चौराहे पर मंदिर। सावन के महीने में आएंगे, तो बहुत संभव है कि तीन -चार घंटे लाइन में लग जाए। और ऐसा भी नहीं है कि महाकाल के दरवाजे पर ही भीड़ होगी। काल भैरव जाएंगे, तो वहां भी यही हाल। दूर-दराज से आए लोग, झुंड अपनी बोली-वाणी में काल भैरव की जय -जय करते मिलेंगे। शहर धार्मिक है, तो इसका असर होटलों के मेन्यू कार्ड पर भी दिखेगा। सिर्फ शाकाहारी (वेज)।
शहर शिप्रा नदी के किनारे बसा है। इसी शिप्रा के प्रमुख घाटों में एक है रामघाट। सिंहस्थ में सर्वाधिक भीड़ का केंद्र यही घाट होता है। शिप्रा नदी पर पुल है, तो आप दोनों ओर आ- जा सकते हैं। पुल के पार एक सड़क दिखती है। लिखा है- बड़नगर। 2003 में डॉ मोहन यादव की गाड़ी बड़नगर जा रही थी पर गाड़ी जा नहीं पाई। उसे थमना पड़ा। अगर चली जाती तो? यह अब इतिहास है। और इस ‘तो’ का जवाब नहीं दिया जा सकता।
कहानी इतनी भर है कि 2003 में बड़नगर से मोहन यादव को बीजेपी ने विधानसभा की टिकट दी थी। बड़नगर भी उज्जैन जिले में है। उज्जैन लोकसभा क्षेत्र में ही है और उज्जैन से बडनगर की दूरी है 55 किलोमीटर। मोहन यादव उज्जैन से बड़नगर जा रहे थे, लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक नेता ने उन्हें टिकट वापस करने को कहा। वे नेता थे माखन सिंह – संघ के नेता। बाद में मध्यप्रदेश बीजेपी के प्रदेश संगठन महामंत्री बनाए गए थे। तब, डॉ मोहन यादव ने कुछ नहीं सोचा। यही सोचा कि जब बड़े कह रहे हैं, तो कुछ बात तो होगी। ऐसे आज्ञाकारी स्वयंसेवक थे/हैं डॉ मोहन यादव। आखिर माखन सिंह ने उनके पास क्या संदेश भेजा था? यही कि अभी आपकी उम्र है। आप एमएलए, एमपी सब बनेंगे। इस बार शांतिलाल धावई को लड़ने दीजिए। शांतिलाल लड़े- जीते। 2003 ही नहीं 2008 में भी जीते। इधर, उमा भारती नाराज थीं कि मोहन ने टिकट वापस क्यों किया? एक बार पूछना तो था? क्या कर लिया इसने? यह अलग बात है कि नाराज़ उमा भारती प्रसन्न भी हुई। डॉ मोहन यादव को उज्जैन विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाया। मंत्री का दर्जा दिया। 2003 के दस साल बाद 2013 में मोहन यादव फिर पार्टी टिकट ले पाए- इस बार उज्जैन दक्षिण से बीजेपी उम्मीदवार। जीते और तब से जीतते जा रहे हैं। फिर वही सवाल – अगर उन्होंने 2003 में टिकट नहीं लौटाई होती तो? अगर वे बड़नगर से ही लड़ते तो? इसका उत्तर देना संभव नहीं है। कुछ सवालों के जवाब होते भी नहीं है।
हकीकत यह कि 2013 में डॉ मोहन यादव ने कांग्रेस उम्मीदवार जय सिंह दरबार को नौ हजार छह सौ वोटों से हराया। जय सिंह का उज्जैन के क्षेत्र विशेष नानाखेड़ा में खासी पकड़ थी। वे कम पढ़े लिखे थे। लेकिन धाकड़ कैंडिडेट थे। 2018 में कांग्रेस ने प्रत्याशी बदल दिया। अब उज्जैन के पूर्व विधायक महावीर वशिष्ठ के मझले सुपुत्र राजेंद्र वशिष्ठ कांग्रेस उम्मीदवार थे। डॉ मोहन जीते। इस बार अठारह हजार वोटों से। कहा यह भी गया कि पिछली बार के कांग्रेस उम्मीदवार जय सिंह निर्दलीय उम्मीदवार थे, यह मदद कर गया। डॉ मोहन यादव अठारह हजार मतों से जीते और निर्दलीय जय सिंह दरबार उन्नीस हजार वोट ले आए थे। राजेन्द्र वशिष्ठ साधन संपन्न उम्मीदवार थे। सब-कुछ था। पर जय सिंह दरबार ने गड़बड़ी कर दी। बागी जो हो गए थे। समय बदला, 2022 में जय सिंह दरबार बीजेपी में आ गए। 2023 में डॉ मोहन यादव के सामने कांग्रेस के चेतन यादव उम्मीदवार थे। उज्जैन के पूर्व महापौर प्रेमनारायण यादव के पुत्र। इस बार भी विजेता डॉ मोहन यादव ही थे। वे तेरह हजार वोटों से जीते। वे उज्जैन दक्षिण से लगातार तीन बार जीतने वाले इकलौते नेता हैं। इसलिए अब यह सवाल बेमानी है कि मोहन यादव टिकट नहीं लौटाते या बड़नगर से चुनाव लड़ते तो क्या होता? कुछ सवालात बेमानी ही होते हैं। यह भी बेमानी ही है। हां, कहते है कि महाकाल का आशीर्वाद डॉ मोहन यादव को मिला। हर चुनाव, हर कदम पर मिला। उज्जैन बीजेपी के अध्यक्ष संजय अग्रवाल ने भी कहा – मोहनजी को महाकाल का आशीर्वाद है जी। क्या सच में???
