झाबुआ। लॉकडाउन के बीच भीषण गर्मी में मजदूरों की घर वापसी की मार्मिक तस्वीरें सामने आई है। एक तस्वीर में एक शख्स तेज धूप में अपने विकलांग और बीमार पिता को कंधे पर बैठाकर पैदल यात्रा कर रहा है। दूसरी तस्वीर में मजदूर और उनके बच्चे तपती धूप में पैदल रेलवे ट्रैक पर सैकड़ो किलोमीटर का सफ़र करते नजर आ रहे हैं। वहीँ एक अन्य तस्वीर में मजदूरों को चार पहिया वाहन में जानवरों की तरह ठूस-ठूस कर भरा जा रहा है। मजदूरो के अग्नीपथ की मार्मिक तस्वीरें शासन-प्रशासन के तमाम इंतजामत की पोल खोल रही है।
दरअसल लॉकडाउन के कारण इन दिनों लाखों मजदूर अपने-अपने घर जाना चाहते हैं। सरकार इन मजदूरों को वापस अपने घर भेजने के लिए तमाम इंतजाम करने के दावें कर रही हैं। लेकिन जमीन पर सरकारी दावें खोखले नजर आ रहे हैं। मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले से तीन अलग-अलग तस्वीरें सामने आई है। इन तस्वीरों से साफ़ है कि सरकार भले ही कुछ भी कहे लेकिन यह गरीब मजदूरों को अपने ही घर जाने के लिए काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
एक तस्वीर झाबुआ जिले के पिटोल बॉर्डर की है। इस तस्वीर में एक शख्स अपने विकलांग और बीमार पिता को कंधे पर बैठाकर पैदल यात्रा करता नजर आ रहा है। यह शख्स इसी तरह गुजरात से कई किलोमीटर पैदल चलकर मध्य प्रदेश की पिटोल बॉर्डर पर पहुंचा। इन तस्वीरों को देख शासन-प्रशासन को शर्मिंदगी महसूस हो या ना हो, लेकिन कलयुग के इस श्रवण कुमार ने तमाम परेशानियों के बीच भी पितृ भक्ति की मिसाल कायम की है।
दूसरी तस्वीर झाबुआ के मेघनगर की हैं। यहां मजदूर अपने बीबी-बच्चों के साथ तपती धूप में रेलवे ट्रैक के सहारे सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर रहे है। कई मजदूरों के पैरों ने घर पहुंचने की जिद में जवाब दे दिया है, तो कई मजदूरों के पैरों में असहनीय छाले पड़ चुके हैं। कई मजदूरों को भूख से बुरा हाल तो, कई मजदूर बिस्कुट खाकर भूख की आग को ठंडा कर रहे हैं। गुरुवार को कुछ मजदूर गुजरात से पैदल चलकर मध्यप्रदेश के भिंड मुरैना को जा रहे थे तभी रास्ते में रेलवे ट्रैक पर मेघनगर पहुंचे। जहां रेलवे पुलिस ने मजदूरों को रेलवे ट्रैक से पकड़ कर स्थानीय प्रशासन के हवाले कर दिया।
वहीँ झाबुआ जिले की पिटोल बॉर्डर से ही एक अन्य तस्वीर में सामने आई है, जिसमें सोशल डिस्टेंसिंग की सरेआम धज्जियां उड़ती नजर आ रही है। दरअसल गुजरात से मध्य प्रदेश घर वापसी कर रहे मजदूरों को घंटों लाइन में लगने के बाद भी बसें नसीब नहीं हो रही है। ऐसे में कुछ छोटे चार पहिया लोडिंग वाहन उपलब्ध भी होते हैं तो मजदूरों को भेड़ बकरियों की तरह लोडिंग वाहन में ठूंस ठूंस कर बैठा दिया जाता है।
भरी धूप में आशा भरी निगाह से अपने पूरे परिवार को लेकर खड़े मजदूर कभी स्वयं व अपने परिवारो के लोगो के पैरों को ठंडक देते हैं तो कई मजदूर कपड़े से छांव की छत बनाकर घंटों सड़कों पर खड़े रहकर अपनी बारी का इंतजार करते। लेकिन शाम होते होते पैर थक जाते हैं लेकिन घर पहुंचने का हौसला जिंदा रहता है। देर रात अंधेरे में प्रशासन द्वारा मजदूरों को मालवाहक लोडिंग ट्रकों में जबरदस्ती केबिन व ट्रकों की छत पर बैठा चोरी छुपे रवाना किया जाता है। मजदूर छत से गिर कर जिंदा रहे या मरे प्रशासन को इससे क्या फर्क पड़ता है, क्योंकि इन अधिकारियों की संवेदना मर चुकी है।
