मध्य प्रदेश स्थापना दिवस पर राजधानी भोपाल के प्रोफेसर अब्दुल हाफ़िज़ मोहम्मद बरकतउल्ला भोपाली पर विशेष लेख।
लेखिका मानसी द्विवेदी (इतिहास विषय की शिक्षिका हैं।
भोपाल की पहचान उसकी झीलों, तहज़ीब और ताज़गी में जितनी बसती है, उतनी ही गहराई से उसके इतिहास में भी धड़कती है।हम सभी ने “बरकतउल्ला विश्वविद्यालय” का नाम अनगिनत बार सुना है। कभी प्रवेश पत्र पर, कभी प्रमाणपत्र पर, तो कभी किसी समारोह की घोषणा मे और तो और रोज हम में से कितने भोपाली लोग विश्वविद्यालय केसामने से गुजरते है।पर क्या हमने कभी ठहरकर सोचा है कि इस विश्वविद्यालय का नाम जिस व्यक्ति पर रखा गया है, वे कौन थे?
एक शिक्षक होने के नाते मुझे बहुत गर्व होता है यह जानकर कि भारत की पहली अस्थायी सरकार के प्रधानमंत्री कोई राजनेता नहीं, बल्कि एक शिक्षक थे और वो शिक्षक थे प्रोफेसर अब्दुल हाफ़िज़ मोहम्मद बरकतउल्ला भोपाली, जिन्होंने भारत की आज़ादी की मशाल को न केवल अपने देश में, बल्कि पूरी दुनिया में प्रज्वलित किया।वे केवल एक अध्यापक नहीं थे, बल्कि विचारों के योद्धा, शब्दों के सेनानी और आत्मा से सच्चे देशभक्त थे। उनकी पहुँच जापान के रास बिहारी बोस से लेकर इंग्लैंड की भीकाजी कामा तक थी। वे उस राह के मुसाफ़िर थे, जो कठिन थी, पर मातृभूमि के प्रेम की रोशनी से आलोकित थी।
उनका जीवन इस पंक्ति का साक्षात् रूप था–
“जब कोई व्यक्ति अपने देश और अपनी जड़ों को याद करते हुए, दुनिया के किसी भी कोने से क्रांति की आग जलाता है, तो इतिहास उसे अमर कर देता है।”
मुझे आज भी याद है, जब मैं 2015 बरकतउल्ला विश्वविद्यालय से बी.एड कर रही थी , तब वहां मेरी मुलाकात वहां के एच ओ डी डॉ. हेमंत खंडैई से हुई। वो बीएड की कक्षा में हम छात्रों का पहला दिन था। बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय में एक कक्षा चल रही थी। हवा में किताबों की खुशबू घुली थी और दीवारों पर ज्ञान का साया था।
बी.एड. के विद्यार्थी शांत बैठे थे, जब प्रोफेसर हेमंत खंडैई सर ने कहा – “आज मैं तुम्हें एक ऐसे अध्याय से मिलवाने जा रहा हूँ, जो इतिहास की किताबों में कम, पर इस विश्वविद्यालय की दीवारों में ज़्यादा लिखा है।”
उन्होंने ब्लैकबोर्ड पर लिखा – “प्रोफेसर बरकतउल्ला भोपाली (1854–1927)”
उनकी आँखों में गर्व था और आवाज़ में श्रद्धा। उन्होंने कहा, “बच्चों, इस विश्वविद्यालय की दीवारों में केवल ईंटें नहीं, बल्कि उस शिक्षक की धड़कनें हैं जिसने अपनी ज़िंदगी को आज़ादी की लौ में समर्पित कर दिया।”

बरकतउल्ला का जन्म 4 जुलाई 1854 को भोपाल की पवित्र धरती पर हुआ था।उनके पिता शेख़ क़ुदरतुल्ला एक सूफ़ी विचारों वाले, सादगी और सच्चाई के प्रतीक व्यक्ति थे।बरकतउल्ला ने सुलेमानिया स्कूल से शिक्षा प्रारंभ की और उर्दू, अरबी व फ़ारसी में अद्भुत निपुणता प्राप्त की। ज्ञान की प्यास ने उन्हें 1883 में बंबई पहुँचाया, जहाँ से शुरू हुआ उनका वह सफ़र जो उन्हें एक विद्यार्थी से विश्वविख्यात क्रांतिकारी शिक्षक बना गया।ब्रिटिश शासन के उस दौर में उन्होंने महसूस किया कि आज़ादी की आवाज़ केवल भारत में नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में गूँजनी चाहिए।1887 में वे इंग्लैंड पहुँचे और वहाँ “इंडियन होम रूल सोसाइटी” तथा “पैन-इस्लामिक मूवमेंट” जैसे संगठनों से जुड़कर अपनी कलम को हथियार बना लिया।उनके लेख ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध गरजते थे। उनके हर शब्द में क्रांति की चिंगारी थी। अंग्रेज़ सरकार उनके विचारों से काँप उठती थी क्योंकि उन्होंने साबित कर दिया था कि “कलम तलवार से अधिक तीखी होती है।”“द टाइम्स ऑफ लंदन” ने लिखा था –
“भारत के बरकतउल्ला – वह विद्वान जो क्रांतिकारी बन गया, जिसके शब्द तलवार से भी तेज़ हैं।”
उनकी कहानी मेरे मन में गूँजने लगी। घर लौटकर मैंने अपने पिताजी से पूछा – “पापा, क्या आप प्रोफेसर बरकतउल्ला भोपाली को जानते हैं?”
पापा मुस्कुराए, बोले – “बेटा, तुम्हारे परदादाजी उनके किस्से सुनाया करते थे। जब भी उनका नाम लिया जाता था, भोपाल की गलियाँ गर्व से भर उठती थीं। वे सिर्फ़ एक शिक्षक नहीं, बल्कि एक ऐसी मशाल थे जो हर दिल में जागरूकता की लौ जलाना चाहते थे।”
मेरे पापा ने बताया – उनकी यात्रा यहीं नहीं रुकी। वे अमेरिका गए और फिर 1909 में जापान पहुँचे, जहाँ टोक्यो विश्वविद्यालय ने उन्हें हिन्दुस्तानी और फ़ारसी भाषाओं के प्रोफेसर के रूप में नियुक्त किया।यह अपने समय का एक असाधारण सम्मान था।पर उनके लिए यह केवल नौकरी नहीं, बल्कि मिशन था।वहाँ से उन्होंने “दीं इस्लामिक फ्रेटरनिटी” और “द कामरेड” जैसी पत्रिकाएँ प्रकाशित कीं, जो एशिया और यूरोप में बसे भारतीयों के बीच स्वतंत्रता की चेतना जगाती थीं। उनके लेख “भारतीय स्वतंत्रता प्रतीक्षा नहीं कर सकती” और “एक अधीनस्थ राष्ट्र की आवाज़” ने उन्हें “मौन भारत की आवाज़” बना दिया।
उनके एक जापानी छात्र ने लिखा –
“जब प्रोफेसर बरकतउल्ला बोलते थे, तो लगता था जैसे किसी सभ्यता की आत्मा शब्दों में उतर आई हो।”
ब्रिटिश सरकार उनके प्रभाव से भयभीत हुई और जापान सरकार पर दबाव डालकर उन्हें विश्वविद्यालय से निकाल दिया।
मेरे पापा कुछ पल के लिए रुके, फिर बोले –“ पर जैसा कि तुम्हारे खंडैई सर ने कहा था – ‘क्रांति को कोई नौकरी से नहीं निकाल सकता।‘ ”
उन बातों ने मेरे मन में गहरी जिज्ञासा जगा दी।मैंने फिर प्रोफेसर बरकतउल्ला के बारे में और गहराई से जानने की जिज्ञासा महसूस की। इंटरनेट पर खोज शुरू की तो सबसे पहले विकिपीडिया पर उनके जीवन से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिलीं।इसके बाद मैंने कुछ ऐतिहासिक पुस्तकों का अध्ययन किया, जिनमें प्रोफेसर बरकतउल्ला भोपाली के उल्लेख ने मेरी रुचि और बढ़ा दी।लेकिन हाल ही में जब मैंने यूरेशिया रिव्यू पर उनके जीवन से जुड़े लेख पढ़े, तो कई ऐसे रोचक और प्रेरक तथ्य सामने आए, जिनसे उनका व्यक्तित्व और भी प्रखर दिखाई दिया।कुल मिलाकर, अपने अध्ययन और अनुसंधान से मैंने यह जानाकि – 1915 में, जब प्रथम विश्व युद्ध चरम पर था, तब प्रोफेसर बरकतउल्ला अफ़ग़ानिस्तान पहुँचे और राजा महेन्द्र प्रताप सिंह के साथ मिलकर भारत की पहली अस्थायी स्वतंत्र सरकार की स्थापना की।राजा महेन्द्र प्रताप राष्ट्रपति बने और बरकतउल्ला प्रधानमंत्री ।यह वह ऐतिहासिक क्षण था जब पहली बार विदेशी धरती पर “आज़ाद भारत” की सरकार बनी।
1 दिसंबर 1915 को सिराज-उल-अख़बर अख़बार ने लिखा –“आज भारत के पुत्रों ने अफ़ग़ानिस्तान की धरती पर अपनी माँ को स्वतंत्र घोषित किया।”
भीकाजी कामा ने पेरिस से संदेश भेजा – “बरकतउल्ला साहब ने साबित किया कि सच्ची शिक्षा वही है जो राष्ट्र की चेतना को जागृत करे।”
रास बिहारी बोस ने लिखा –“जब मैं बरकतउल्ला को बोलते देखता था, तो लगता था जैसे इतिहास स्वयं हमारे सामने खड़ा हो।”
भारत को आजादी मिलने के बाद हमारे प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जी ने अपनी जीवनी” टुवर्ड्स फ्रीडम” में बरकतउल्ला भोपाली के बारे में लिखा:
“आज़ाद हिन्दुस्तान के पहले प्रधानमंत्री और ग़ुलाम हिन्दुस्तान के पहले प्रधानमंत्री की मुलाकात ब्रुसेल्स (बेल्जियम) की सम्राज्य विरोधी आलमी कॉन्फ्रेंस में हुई थी, फरवरी 1927 में।”
यह उल्लेख इस बात का प्रतीक है कि नेहरू जैसे महान नेता भी उनके अद्वितीय योगदान से प्रभावित थे।
बरकतउल्ला भोपाली को अपने शहर भोपाल से कितनी मोहब्बत थी, इसका एक सबूत उनके एक ख़त से मिलता है, जिसमें उन्होंने लिखा था —
“हम कर्रा-ए-अर्ज़ के पेरामों दो बार गर्दिश कर चुके और दुनिया के बड़े-बड़े लोग देखे,
मगर भोपाल के सीधे-सादे लोग, छोटे-छोटे मकान, तंग-तंग गलियाँ अब तक महबूब और मरग़ूब ख़ातिर हैं।”
इन पंक्तियों में झलकता है एक सच्चे भोपाली का दिल, जो विश्वयात्री होने के बावजूद अपनी मिट्टी से जुदा न हुआ। बाद में वे ग़दर पार्टी से जुड़े और जर्मनी, तुर्की तथा रूस में भारत की आज़ादी के लिए समर्थन जुटाते रहे। उनका जीवन यात्राओं से भरा था, पर यह यात्राएँ भौतिक नहीं, बल्कि वैचारिक थीं।वे जहाँ भी गए, भारत की मिट्टी की खुशबू उनके साथ रही।लोग उन्हें “क्रांति के प्रोफेसर” कहकर पुकारते थे।
रास बिहारी बोस ने एक बार कहा था –“बरकतउल्ला के पास किताबें नहीं, बल्कि ऐसे विचार थे जो पीढ़ियाँ बदल सकते थे।”
20 सितंबर 1927 को सैन फ्रांसिस्को में उन्होंने अंतिम सांस ली, पर उनकी आत्मा आज भी भोपाल की हवाओं में तैरती है। इस रात अपने साथियों से अपने पूरे होशों-हवास में उन्होंने कहा था —‘तमाम ज़िन्दगी मैं पुरी ईमानदारी के साथ अपने वतन की आज़ादी के लिए जद्दोजहद करता रहा. ये मेरी ख़ुश-क़िस्मती थी कि मेरी नाचीज़ ज़िन्दगी मेरे प्यारे वतन के काम आई. आज इस ज़िन्दगी से रुख़्सत होते हुए जहां मुझे ये अफ़सोस है कि मेरी ज़िन्दगी में मेरी कोशिश कामयाब नहीं हो सकी, वहीं मुझे इस बात का भी इत्मिनान है कि मेरे बाद मेरे मुल्क को आज़ाद करने के लिए लाखों आदमी आज आगे बढ़ आए हैं, जो सच्चे हैं, बहादुर हैं और जांबाज़ हैं. मैं इत्मिनान के साथ अपने प्यारे वतन की क़िस्मत उनके हाथों में सौंप कर जा रहा हूं…’
बरकतउल्ला विश्वविद्यालय की हर ईंट, हर दीवार, हर कक्षा उनका संदेश दोहराती है – “ज्ञान केवल परीक्षा के लिए नहीं, परिवर्तन के लिए होना चाहिए।”
1970 में भोपाल विश्वविद्यालय की स्थापना हुई, और 1988 में इसका नाम बदलकर “बरकतउल्ला विश्वविद्यालय” रखा गया ,ताकि शिक्षा की यह भूमि उस शिक्षक के नाम से जगमगाए जिसने राष्ट्र को विचारों से दिशा दी । स्थापना समारोह में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अर्जुन सिंह ने कहा था – “हम चाहते हैं कि इस विश्वविद्यालय से ऐसे विद्यार्थी निकलें जो बरकतउल्ला की तरह अपने विचारों से देश को दिशा दें।”
