धार। कोरोना संकट के कारण आदिवासियों के बीच एक बार फिर से सालों पुरानी परंपरा ‘लुगड़ा-लाड़ी’ परम्परा का चलन बढ़ गया है। इससे कोरोना संक्रमण फैलने की आशंका भी नहीं रहती और कमजोर हो रही आर्थिक स्थिति में ज्यादा खर्च भी नहीं करना पड़ता है।
दरअसल आदिवासी समाज में पहले लुगड़ा-लाड़ी का चलन बहुत अधिक था। लेकिन जैसे समाज में संपन्नता आने लगी इसका चलन लगभग बंद हो गया था। इन दिनों कोरोना संकट के कारण प्रशासन ने ज्यादा लोगों के एक जगह इकट्ठा होने पर प्रतिबंध लगा दिया है। वहीं लॉकडाउन के कारण आदिवासियों की आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी है। इस कारण आदिवासी समाज में एक बार फिर से लुगड़ा-लाड़ी का चलन शुरु हो गया है।
लुगड़ा-लाड़ी का अर्थ होता है बिना फेरे और खर्च के वधु को वर को सौंपना। इस शादी में न भोजन होता है, न मांदल बजती है, न कोई सार्वजनिक समारोह होता है। ऐसे में शादी में खर्च नाम मात्र का होता है। इस कारण इन दिनों आदिवासी समाज के बीच लुगड़ा-लाड़ी का चलन बहुत अधिक बढ़ गया है। इससे ज्यादा लोगों के एक जगह इकट्ठा नहीं होने संक्रमण के खतरा भी नहीं फैलता और आर्थिक संकट के बीच शादी में खर्च भी नहीं करना पड़ता है।
बता दे कि लुगड़ा-लाड़ी परम्परा के तहत किसी भी तरह की धार्मिक क्रिया भी नहीं होती है। लेकिन लुगड़ा-लाड़ी के तहत शादी करने वाले वर-वधु को यह रीती-रिवाज अपने बच्चों की शादी में पूरे करने होते हैं। यानी कि जब इनके बच्चे बढ़े होंगे तो उनकी शादी के साथ पति-पत्नी भी फेरे लेंगे एवं शादी की रस्म संपन्न करेंगे। उसके बाद बच्चों की शादी होगी।
