बैतूल। मध्यप्रदेश के बैतूल जिला मुख्यालय से लगभग 8 किलोमीटर दूर स्थित त्रिवेणी गोशाला में मवेशियों के गोबर और गौ-मूत्र का वैज्ञानिक निस्तारण किया जाता है। यहां गोबर से शवदाह के लिए लकड़ियाँ बनाई जाती है। इससे पर्यावरण संरक्षण भी हो रहा है और गोशाला को अतिरिक्त आमदनी भी हो रही है।
दरअसल एनजीटी ने डेयरियों और गोशाला को मवेशियों के गोबर और मलमूत्र के वैज्ञानिक निस्तारण के लिए गाइड लाइन बनाने के लिए आदेश दिए हैं। लेकिन त्रिवेणी गोशाला में यह काफी पहले से हो रहा है। 16 एकड़ में फैली त्रिवेणी गोशाला में इस समय 240 गायें रहती है। इस गोशाला से रोजाना बड़ी मात्रा में गोबर और गोमूत्र निकलता है।
त्रिवेणी गोशाला के संचालक ने बताया है कि हम गोबर को फेंकने की बजाय उससे शवदाह के लिए उपयोग में आने वाली लकड़ी बनाते है। गोबर की लकड़ी से शवदाह करने पर खर्चा कम होता है, इसलिए लोग इसका उपयोग कर रहे है। इसके उपयोग से पर्यावरण संरक्षण भी हो रहा है क्योंकि गोबर की लड़की के उपयोग होने से कई पेड़ों की कटाई होने से बच जाती है। इससे गोशाला को आमदनी भी हो रही है।
इसके अलावा गो-मूत्र का उपयोग फसलों में उपयोग किया जाता है। गो-मूत्र से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है। ऐसे में इसके उपयोग से पेड़, पौधों और फसलों को लाभ होता है।
