डॉ हिमांशु जोशी, भोपाल। बीजेपीं में 27 सीटों पर होने वाले उपचुनाव को जीतने से पहले अपने घर की कलह से निपटना ज़्यादा ज़रूरी है । बीजेपी को अपनों से ही भीतरघात का ख़तरा नज़र आ रहा है। उपचुनाव को लेकर हुई भाजपा की फीडबैक बैठक में कई बड़े नेता नहीं आये। करीब 18 सीटों पर प्रभारी अब तक गए ही नहीं, विधायक का काम करने से इंकार कई नज़ारे बता रहे हैं की राह आसान नहीं है।
पहला नजारा
सत्ता नहीं बचेगी तो आपका रुतबा भी नहीं बचेगा परेशान मुख्यमंत्री को कहना पड़ा-काम करो, नहीं तो सरकार चली जायेगी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने चुनाव की बैठक में कही। इसके बाद प्रदेश के संगठन मंत्री सुहास भगत ने सरकार के कैबिनेट मंत्री विजय शाह को जमकर आड़े हाथों लेते हुए कहा उपरी तौर पर काम करने की प्रवृत्ति नहीं चलेगी जवाबदारी दी गई है उसे पूरा करें।
दूसरा नजारा
इसके बाद सिरोंज के विधायक उमाकांत शर्मा ने कहा जिस सीट की ज़िम्मेदारी मुझे मिली है वह मेरे अनुकूल नहीं है। इसलिए अभी तक मैं वहाँ नहीं गया । इस पर भगत ने सख़्त लहजे में कहा किस सीट पर जाना है य न जाना है यह पार्टी तय करती है आप नहीं। आज तो आपने कह दिया आइंदा न कहना।
18 सीट पर भाजपाई काम करने को तैयार नहीं
कांग्रेस से भाजपा में लाये गए सिंधिया समर्थकों की सीट पर बगावत दिखाई दे रही है। सिंधिया समर्थकों की 18 सीटें ऐसी है, जिसपर भाजपाई कोई भी मदद को तैयार नहीं है।
छह से ज्यादा मंत्री अपने प्रभार क्षेत्र में नहीं गए
भाजपा विधायक, मंत्री व सांसदों की बैठक में ये खुलकर सामने आ गया। छह से ज्यादा मंत्री और करीब दस विधायक उन सीटों पर अब तक गए ही नहीं जहां के वे प्रभारी हैं। जिन सीटों पर प्रभारी जा रहे हैं, वहां भी वे बहुत गंभीर नहीं हैं। सिंधिया के ख़ास तुलसी सिलावट और गोविन्द सिंह राजपूत की सीट पर भी अंदरखाने यही हाल है। वहीं मालवा निमाड़ की सीटों पर कोई सक्रियता नहीं है।
16 सीटों वाले चम्बल-ग्वालियर में हालत ख़राब
16 सीटों वाले चम्बल-ग्वालियर में सब कुछ ज्योतिरादित्य सिंधिया के भरोसे हैं। वहां प्रभात झा और जयभान सिंह पवैया के अलावा सिंधिया को लोकसभा चुनाव में परास्त करने वाले केपी सिंह यादव भी बहुत सक्रिय नहीं हैं। सिंधिया अपने ग्वालियर दौरे में बड़ी बगावत का सामना कर चुके हैं। बदनावर से उन्होंने कहा कि कई लोग सीटों पर नहीं गए। यह ठीक नहीं। सूत्रों के अनुसार बैठक में कई सीटों पर चिंता जाहिर की गई। अपनी ही पार्टी में सिंधिया समर्थकों की खिलाफत से निपटने का भाजपा को कोई रास्ता नहीं सुझ रहा। भाजपा ने यदि अपने विधायकों पर ज्यादा दबाव बनाया तो उनके टूटने का भी डर है।
