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कहा जाता है की दृढ़ निश्चय और दृढ़ इच्छाशक्ति से दुनिया में कुछ भी संभव है। ऐसा ही कुछ कर दिखाने वाली राजधानी
भोपाल की शिक्षिका डॉ. अर्चना शुक्ला हैं। वे गवर्नमेंट महात्मा गांधी स्कूल बरखेड़ा में पदस्थ हैं। डॉ शुक्ला की पहचान उनके अनूठे गौरैया संरक्षण अभियान के कारण भी है। डॉ. शुक्ला पिछले करीब 16 वर्षों से शासकीय विद्यालय में विद्यार्थियों को पढ़ा रही हैं और विज्ञान शिक्षण को पारंपरिक तरीके से अलग बनाकर प्रोजेक्ट आधारित शिक्षण पर काम कर रही हैं।
ताज़ा अपडेट के मुताबिक़ गवर्नमेंट स्कूल के बच्चों को पढ़ाई के साथ नवाचार कराने वाली डॉ. अर्चना शुक्ला को राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान 2026 के लिए चुना गया है। मध्य प्रदेश से इस प्रतिष्ठित सम्मान के लिए दो शिक्षकों का चयन हुआ है। इनमें सीधी के शिक्षक शैलेंद्र प्रताप सिंह और भोपाल की शिक्षिका डॉ. अर्चना शुक्ला शामिल हैं।
गौरैया संरक्षण से शुरू हुआ अनूठा प्रयोग
डॉ शुक्ला के प्रयास से परियोजना आधारित शिक्षण के तहत विद्यार्थियों ने गौरैया संरक्षण पर काम किया। बच्चों ने शोध पत्रों के जरिए यह समझने की कोशिश की कि गौरैया की संख्या क्यों कम हो रही है। इसके बाद विद्यार्थियों ने वैज्ञानिक तरीके से नेस्ट बॉक्स तैयार किए। डॉ. शुक्ला के अनुसार, विद्यार्थियों द्वारा तैयार किए गए नेस्ट बॉक्स भारत में बच्चों द्वारा तैयार किए गए शुरुआती प्रयोगों में शामिल रहे और कक्षा 11वीं जीव विज्ञान के विद्यार्थियों ने इस विषय पर शोध पत्र भी प्रकाशित किया।
सेव सीड ने दी नई राह
इसके बाद बीज संरक्षण के लिए ‘सेव सीड’ परियोजना शुरू की गई। विद्यालय में कूड़ेदान के साथ बीज रखने के लिए अलग डिब्बे भी रखे जाते हैं। उनका मानना है कि बीज कचरा नहीं, बल्कि भविष्य की जैव विविधता का आधार हैं।
डॉ. शुक्ला का कहना है कि शासकीय स्कूलों में आने वाले कई विद्यार्थी आर्थिक रूप से भले ही संपन्न न हों, लेकिन उनमें प्रतिभा और क्षमता की कोई कमी नहीं होती। जरूरत सिर्फ उन्हें सही अवसर और सहयोग देने की है।
5 हजार पेड़ों को दी पहचान,प्रकृति-तकनीक से जोड़ा
विद्यार्थियों को प्रकृति और तकनीक से जोड़ने के लिए पेड़ों पर क्यूआर कोड लगाने की परियोजना भी शुरू की गई। अब तक मध्य प्रदेश के अलग-अलग जिलों में लगभग पांच हजार पेड़ों पर क्यूआर कोड लगाए जा चुके हैं। इस परियोजना के दौरान एक विद्यार्थी में पेड़ों को लेकर ऐसी रुचि विकसित हुई कि उसने आगे चलकर आईआईटी रुड़की में प्रवेश लिया।
डॉ. शुक्ला के विद्यार्थी कई क्षेत्रों में आगे बढ़ रहे हैं। इनमें एमबीबीएस, बीएससी, फॉरेंसिक विज्ञान और जैव सूचना विज्ञान जैसे क्षेत्र शामिल हैं। उनका कहना है कि छोटी उम्र में बच्चों को प्रयोग और शोध का अवसर देने से उनके भीतर आत्मविश्वास और नई चीजें सीखने की जिज्ञासा विकसित होती है।
पौधों से बातचीत पर जापान तक पहुंचा प्रोजेक्ट
कक्षा में पढ़ाते समय जब उन्होंने बच्चों से कहा कि पेड़ हमारी भावनाओं को समझ सकते हैं, तो विद्यार्थियों ने इसे प्रयोग के जरिए जांचने की इच्छा जताई। इसके बाद ‘प्लांट इमोशन’ परियोजना शुरू की गई। इसमें बच्चे पौधों से बातचीत करते हैं और उनकी वृद्धि में होने वाले अंतर का अध्ययन करते हैं। इस परियोजना को उनके एक विद्यार्थी ने जापान में प्रस्तुत किया।
42 देशों के सामने प्रस्तुत किया
इसी तरह रोजमर्रा की समस्या का समाधान तलाशते हुए विद्यार्थियों ने एक ऐसा क्यूआर कोड तैयार किया, जिसमें प्रमाण पत्र और तस्वीरें सुरक्षित रखी जा सकती हैं। यह क्यूआर कोड पासवर्ड से सुरक्षित है। डॉ. शुक्ला के अनुसार, जून में उन्होंने इस परियोजना को 42 देशों के सामने भी प्रस्तुत किया।
मिल चुके हैं कई सम्मान
डॉ. अर्चना को इससे पहले भी शिक्षा और प्रकृति संरक्षण के क्षेत्र में कई सम्मान मिल चुके हैं। वर्ष 2020 में उन्हें प्रदेश के राज्यपाल द्वारा सम्मानित किया गया। वर्ष 2021 में उन्हें वार्षिक जैव विविधता पुरस्कार और पिछले वर्ष दिल्ली में उन्हें ‘नेक्सस ऑफ गुड’ सम्मान भी मिला।
