उमरिया। जिन्हें हम महज पत्थर मानकर छोड़ देते हैं, वे पत्थर एक शख्स का हाथ लगते ही बोल पड़ते हैं। प्रदेश के एक शख्स ने इन्हीं बेजुबान पत्थरों की कला का अद्भुत संसार रचाया है। ये बीते 25 सालों से हजारों-लाखों वर्ष पुराने पत्थरों का संग्रहण कर अब तक यह हजारों पत्थरो को इस हुनर से नया रूप दे चुके हैं। इनके हर पत्थर में कला की अद्भुत दुनिया रची बसी है। इस अद्भुत कलेक्शन को नाम दिया गया है ‘बोलते पत्थर’।
दरअसल उमरिया जिले के निवासी विनोद श्रीवास्तव ने पिछले 25 सालों में आकाशकोट अंचल से नर्मदा नदी के किनारे से ढूंढकर हजारों पत्थरो का संग्रहण किया है। यह पत्थर हजारों लाखों वर्ष पुराने है। इन पत्थरों न तो तराशा गया हैं और न ही इनमें कोई कारीगरी की गई है। यह पत्थर हजारों लाखों वर्ष पुराने जमीन के अंदर हुए प्रकृति के बदलावों के परिणाम हैं। जानकारों का दावा है कि यह लाखो वर्ष पूर्व के समुद्री अवशेष है।
विनोद ने इन पत्थरों के कलेक्शन को ‘बोलते पत्थर’ नाम दिया है। वह इन पत्थरों को दुनिया में पहचान दिलाने में लगे हुए है। विनोद अपने कलेक्शन को देश के कोने-कोने में ले जाकर प्रदर्शनी लगाते हैं। शुरुआत में विनोद को काफी संघर्ष करना पड़ा, लेकिन धीरे धीरे उनकी पहचान बनती गई। आज वह देश के नामी गिरामी फासिल्स एवं बोनसाई क्लब के मेंबर बन चुके है।
विनोद को इस काम में उनकी बेटी भी मदद करती है। उमरिया सहित अमरकंटक एवं नर्मदा नदी के आसपास इस तरह के फासिल्स प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। जानकारों का मानना है कि ये फासिल्स मेराइन नेचर के हैं जो यह साबित करता है कि यहां पहले समुद्र था।
आज के दौर में देश एवं दुनिया मे इन फासिल्स पत्थरों का महत्व काफी बढ़ गया है। इंटिरियर डेकोरेशन से लेकर धार्मिक कार्यों तक में इनके उपयोग का प्रचलन बढ़ रहा है. उमरिया एवं आसपास मौजूद इन लाखो करोड़ो साल पुराने अवशेषों को पहचानने तलाशने का काम न के बराबर हो रहा है।
जानकर मानते हैं कि यहां पहले टेथिस नाम का सागर था जो कालांतर में पहाड़ में परिवर्तित हुआ है। इसी के नीचे समुद्री जीवों के बड़ी मात्रा में अवशेष मौजूद हैं जो अब फासिल्स में परिवर्तित हो गए हैं। जानकारों ने इलाके में अवशेषों के सूक्ष्म अध्ययन की मांग करते हुए कहा है कि इनके अध्ययन का जिम्मा विश्वविद्यालयों को देने की बात कही है।
उमरिया जिला बाघों के अलावा अपनी समृद्ध कला संस्कृति के लिए दुनिया भर में मशहूर है लेकिन फ़ासिल्स पत्थरो की प्रचुर मात्रा में मौजूदगी की बात अभी तक न तो समाज के जेहन में आ पाई है न सरकार के। विनोद श्रीवास्तव का प्रयास महज एक शुरुआत है अगर सरकार भी इस दिशा में कुछ कारगर पहल करे तो इलाके को एक नई पहचान के साथ साथ युवाओं के अध्ययन एवं रोजगार के लिए नई पहचान मिल सकेगी।
