रीवा। कड़कनाथ वेटनरी कालेज के छात्रों के लिए रिसर्च के साथ-साथ रोजगार का जरिया भी बन गया है। छात्र जहाँ एक तरह कड़कनाथ पर रिसर्च का हुनर सीख रहे है वंही दूसरी तरफ इससे पैसे भी कम रहे हैं। कड़कनाथ प्रजाति के मुर्गे व्यवसाय का दर्जा दिया जा सके और किसानो के लिए रोजी रोटी का जरिया बन सके इसके लिए आदिवासी किसानो को प्रसिक्षित भी किया जा रहा है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नई दिल्ली द्वारा रीवा वेटनरी कॉलेज के छात्रों को कड़कनाथ प्रजाति के बारे में जानकारी दी जा रही है। इससे छात्र जहाँ रिसर्च के हुनर सीख रहे है वंही यह उनके लिए स्वरोजगार का साधन भी बनता जा रहा है।
दरअसल कड़कनाथ मुर्गों के बड़े होने के बाद उनको बाजार में बेच दिया जाता है। इससे मिलने वाली राशी में से मुनाफा काट कर उसे छात्रों में बाट दिया जाता है। यहाँ छात्रों को कड़कनाथ के रखरखाव और लालन पालन की जानकारी दी रही है। साथ ही इनमे होने वाली बीमारी और उनके उपायों के बारे में भी बताया जा रहा है।
दरअसल मुर्गों में कड़कनाथ एक ऐसी प्रजाति है जो कई तरह से काफी लाभकारी है। यही कारण है कि प्रदेश सरकार भी इस प्रजाति को बढ़ावा देना चाहती है। रीवा वेटनरी कालेज में कड़कनाथ नस्लों का पालन किया जा रहा है। कड़कनाथ नस्ल का मांस काला होता है। कड़कनाथ में ख़ास बात यह हैं कि इनमे प्रोटीन की मात्रा ब्रायल मुर्गियों की अपेछा चार से पांच प्रतिशत प्रोटीन ज्यादा होता है। इनमे आयरन भी ज्यादा होता है जो बच्चो, गर्भवती महिलाओं और ह्रदय एवं सांस जैसी बीमारियों के लिए काफी फायदेमंद होता है। कड़कनाथ प्रजाति की मुर्गियों के अण्डों में वसीय अम्ल ज्यादा होता है जो काफी फायदेमंद होता है।
कड़कनाथ प्रजाति को व्यवसाय का दर्जा दिया जा सके साथ ही यह आदिवासी किसानों के लिए कैसे रोजी रोटी का जरिये बने और किस तरह से इससे वो फायदा कमा सके इसके लिए किसानो को प्रसिक्षित भी किया जाता है। हाल ही में सीधी जिले के कुछ किसानो को प्रशिक्षण भी दिया गया था और उसके बाद उन्हें पांच-पांच चूजे मुफ्त दिए गए थे।
