देवास। देवास जिले के बागली नगर की महिलाओं ने वंचित वर्ग के बच्चों को अच्छा खाने देने के लिए अभिनव पहल शुरू की है। महिलाओं का यह समूह पहले अपनी सदस्य महिलाओं के घरों से विभिन्न प्रकार का खाद्य पदार्थ एकत्र करती है। इसके बाद इन खाद्य पदार्थ को वंचित वर्ग के बच्चों को एक साथ बैठकर परोसती है।
दरअसल मध्य निम्न मजदूर वर्ग और मध्यम वर्ग के परिवारों के भोजन में एक बड़ी खाई है। मध्यम वर्ग के परिवारों में जहाँ लजीज व्यंजनों का लुफ्त उठाया जाया है वहीँ निम्न मजदूर वर्ग में बमुश्किल दो वक़्त के खाने की व्यवस्था हो पाती है। ऐसे में इस खाई को पाटने के लिए नगर की कुछ महिलाओं ने चार माह पहले रोटी बैंक का गठन किया। इस समूह में नगर के प्रत्येक वर्ग की महिलाएं शामिल है।
समूह की महिलाएं अपनी सदस्य महिलाओं के घरों से भोजन एकत्र कर वंचित वर्ग के बच्चों को खिलाती है। कभी-कभी लाभान्वित बच्चों की संख्या 50 से 60 तक होती है। इसमें निम्न मजदूर वर्ग के परिवारों के 3 से 10 वर्ष की आयु के बच्चे शामिल होते हैं जो सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। महिलाएं यह काम रविवार के दिन करती है क्यों कि उस दिन स्कूलों और मध्यान्ह भोजन की छुट्टी होती है।
वर्तमान समय में लगभग 20 से अधिक परिवार रोटी बैंक से जुड़े हैं। समूह की महिलाओं ने नया साल भी कृषि मजदूरी आधारित व दिहाड़ी करने वाले परिवारों के बच्चों के साथ मनाया। इस दौरान सभी बच्चों को कई प्रकार के व्यंजन परोसे गए, जलेबी का वितरण हुआ और केक काटकर नए साल का जश्न मनाया। बैंक की महिलाओं शोभा गोस्वामी, सुनीता उदावत, अन्नू बजाज, कीर्ति शर्मा, नीलू सोनी, प्रमिला तंवर, शिखा शर्मा, सोनाली चौधरी एवं गीता चौधरी ने बच्चों से विगत एक पखवाड़े में हुई स्कूल व आंगनवाड़ी की गतिविधियों की जानकारी भी ली। शारीरिक साफ-सफाई और घर आंगन की स्वच्छता का जायजा लिया। साथ ही जरूरतमंदों को ऊनी सहित अन्य कपड़े भी प्रदान किए।
बैंक की प्रमुख सदस्य श्रीमती गोस्वामी व श्रीमती उदावत ने बताया कि पहले हम परिवार में किसी के जन्मदिन या खुशी के अवसर पर मरीजों या स्कूली बच्चों के मध्य पहुंचकर दूध-बिस्किट या फल वितरित करते थे। लेकिन यह कार्य वर्ष में एक या दो बार ही किया जा सकता था। शासन स्कूल व आंगनवाड़ियों में पोषण आहार और मध्यान्ह भोजन अवश्य प्रदान करता है लेकिन फिर भी इनके और हमारे खाने में जमीन आसमान का अंतर होता है। इसलिए इस खाई को पाटने के लिए हमने 4 माह पूर्व रोटी बैंक शुरू करने के विकल्प पर गंभीरता से विचार किया। हमारे निकट सहयोगियों व परिचितों और इष्टमित्रों से सप्ताह में एक दिन खाद्य पदार्थो में एक या एक से अधिक व्यंजन अधिक बनाने की चर्चा की। साथ ही कम साधनों में सुपोषित आहार पकाने के तरीके सिखाने का विकल्प भी सामने आया। जिस पर पहले तो कम ही महिलाएं तैयार हुई लेकिन जब पहले रविवार को नगर के वार्ड 5 व 6 में रेणुका माता मंदिर में यह आयोजन हुआ और किसी के घर से रोटियां, बाटी, बाफले, पूड़ी और पराठों सहित दाल, कड़ी, मिक्स वेज, उपमा, इडली, सांभर आदि खाद्य पदार्थ बच्चों को बैठाकर परोसे गए तो उससे बड़ी ही आत्मिक शांति मिली। इसके बाद समूह में महिलाओं की संख्या बढ़ती गई।
रोटी बैंक की पहुंच आसपास के कई नगरीय ग्रामीण और ठेठ ग्रामीण इलाकों तक हो चुकी है। जिसमें नगर के वार्ड 5 व 6 के रेणुका माता मंदिर और महाविद्यालय का क्षेत्र, आरिया व सुरजननगर, राजगढ़ व कुकड़ीपुरा, निमगोया सहित ग्रामीण बस्तियों व मजरे और टोले शामिल है। रोटी बैंक से जुड़ी महिलाओं ने चर्चा में बताया कि हमारे कार्यक्रम में 10 वर्ष तक के बच्चों को ही शामिल किया जाता है। लेकिन उम्र का सर्टिफिकेट तो देखा नहीं जाता है। उसमें कई बार किशोरियां भी शामिल होती है और उनमें यौन अशिक्षा की कमी साफ नजर आती है। जिसके कारण वे भ्रमित होकर भ्रामक जानकारियों का अनुसरण करने लगती है। शर्म के चलते इन समस्याओं को वे किसी के समक्ष उठा भी नहीं पाती है। क्योंकिं कई बार घर पर भी इसका उपचार या सही सलाह नहीं मिल पाती है। कुछ कार्यक्रमो में किशोरियों ने घुलने मिलने के बाद कुछ साधारणतया होने वाली समस्याओं को उठाया जिसका हमने समुचित हल भी किया लेकिन वास्तव में ग्रामीण आदिवासी इलाकों में यौन अवेर्नेस से जुड़े कार्यक्रम शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग को मिलकर चलाने चाहिए।
