बालाघाट। लॉकडाउन में एक प्रवासी मजदूर ने अपनी गर्भवती पत्नी के साथ हाथ गाड़ी पर बेटी को बैठाकर 800 किलोमीटर का सफर तय किया। मजदूर ने गाड़ी को रस्सी से बांधा और गाड़ी खींचते हुए लगातार 17 दिनों तक चलता रहा। बालाघाट की रजेगांव सीमा पर जब पुलिसकर्मियों ने मजदूर को देखा तो वह भी अवाक् रह गए। इसके बाद पुलिसकर्मियों ने बच्ची को चप्पल व बिस्किट दिए और पूरे परिवार का स्वास्थ्य परिक्षण करवाया। इसके बाद पुलिसकर्मियों ने पूरे परिवार को निजी वाहन से उनके गाँव भेजा।
दरअसल लॉकडाउन के कारण काम बंद होने से इन दिनों बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर अपने घरों की तरफ लौट रहे हैं। इस दौरान मजदूरों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। लगातार मजदूरों की दर्द भरी कहानियां सामने आ रही है। ऐसी ही एक कहानी है कुंडेमोहगांव में रहने वाले प्रवासी मजदूर रामू की।
रामू काम की तलाश में अपने परिवार के साथ हैदराबाद गया हुआ था, लेकिन लॉकडाउन में काम मिलना बंद हो गया तो घर आने के लिए उसने कई लोगों से मिन्नतें कीं। कहीं सुनवाई नहीं होते देख रामू अपनी गर्भवती पत्नी और बेटी के साथ पैदल ही घर के लिए निकल पड़ा। बेटी के पैर में चप्पल ना होने के कारण वह बेटी को गोद में उठाकर चलता रहा और उसकी गर्भवती पत्नी सामान उठाकर। कुछ दूर चलने के बाद हाथ से बनी गाड़ी पर बेटी को बिठाया और उसे रस्सी से बांधकर खींचने लगा।
रामू और उसके परिवार ने इस तरह 17 दिनों में पैदल ही 800 किलोमीटर का सफर तय किया। जब रामू अपने परिवार के साथ बालाघाट की रजेगांव सीमा पर पहुंचा तो उसे देख पुलिसवालों का भी कलेजा हिल गया। उन्होंने बच्ची को बिस्किट और चप्पल लाकर दी और परिवार की जाँच कराई। इसके बाद एक निजी गाड़ी का बंदोबस्त किया और उसके गांव तक भेजा।
लांजी के एसडीओपी ने इस बारे में बताया कि हमें बालाघाट की सीमा पर एक मजदूर मिला जो अपनी पत्नी धनवंती के साथ हैदराबाद से पैदल आ रहा था। साथ में दो साल की बेटी थी जिसे वह हाथ की बनी गाड़ी से खींचकर यहां तक लाया था। हमने पहले बच्ची को बिस्किट दिए और फिर उसे चप्पल लाकर दी। फिर निजी वाहन से उसे उसके गांव कुंडेमोहगांव भेजा।
