आगर। मध्यप्रदेश में उपचुनावों की सुगबुगाहट शुरु होते ही आगर विधानसभा से उम्मीदवारों को लेकर जोर आजमाइश शुरू हो गई हैं। खासकर भाजपा की ओर से यहां टिकट के कई दावेदार सामने आ रहे हैं। ऐसे में भाजपा को यहां उम्मीदवार तय करने और गुटबाजी रोकने में काफी परेशानी होने वाली है।
दरअसल मध्यप्रदेश में 24 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने वाले हैं। उनमें से 22 सीटों पर कांग्रेस छोड़कर आए सिंधिया समर्थक पूर्व विधायकों को भाजपा से टिकट मिलना तय माना जा रहा है। लेकिन जिन दो सीटों पर टिकटों को लेकर सबसे ज्यादा कशमकश हैं, उनमें एक सीट आगर विधानसभा की है।
2018 के विधानसभा चुनाव में आगर विधानसभा सीट से स्व मनोहर ऊंटवाल ने जीत दर्ज की थी। लेकिन उनके निधन के बाद इस सीट पर फिर चुनाव होने वाला है। भाजपा की ओर से इस सीट पर कई दावेदार हैं, ऐसे में किसको टिकट मिलता है यह देखना दिलचस्प होगा।
भाजपा द्वारा स्व मनोहर ऊंटवाल के प्रति आस्था जताते हुए उनके पुत्र को टिकट देने की चर्चा जोरों पर है। लेकिन इस सीट पर भाजपा के तीन पूर्व विधायक रेखा रत्नाकर, गोपाल परमार, लालजीराम मालवीय भी दावेदार हैं, जो एक भी चुनाव नहीं हारे हैं, लेकिन हर चुनाव में नए को टिकट देने से तीन पूर्व विधायक आगर को मिले हैं। ऐसे में देखना होगा कि भाजपा अपने किसी पूर्व विधायक को टिकट देती है या फिर मनोहर ऊंटवाल के पुत्र को सहानुभूति वोटों के लिए मैदान में उतारती है।
उपचुनाव में आगर विधानसभा सीट पर भाजपा को गुटबाजी से जूझना पड़ सकता है। तीनों पूर्व विधायक टिकट की आस लगाए बैठे हैं। ऐसे में पार्टी को तीनों विधायकों के बीच सामंजस्य बैठाना बड़ी चुनौती होगी।
वहीं अगर कांग्रेस की बात करे तो यहां से एनएसयूआई के प्रदेशाध्यक्ष विपिन वानखेड़े को वापस से मौका मिल सकता है। 2018 के विधानसभा चुनाव में भी यहां से कांग्रेस के टिकट पर विपिन वानखेड़े ही उम्मीदवार थे और भाजपा के स्व मनोहर ऊंटवाल के खिलाफ वह महज 2500 वोटों से हारे थे। ऐसे में कांग्रेस की ओर से एक बार फिर से विपिन वानखेड़े को ही टिकट मिलना तय माना जा रहा है। वैसे भी विपिन वानखेड़े प्रदेश स्तरीय नेता हैं, इसलिए उनका टिकट कटे, इसकी संभावना कम नजर आती है। लेकिन उनके सामने भी मैदानी इलाकों में सभी गुटों से संतुलन बनाने की चुनौती होगी।
