बैतूल। जहाँ एक तरफ दुनिया बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग के खतरों से जूझ रही है, वहीँ दूसरी तरफ प्रदेश का एक गाँव ऐसा भी है जिसने पर्यावरण संरक्षण के मामले में एक मिसाल कायम की है। इस गाँव के हर घर में आईआईटी छात्रों द्वारा निर्मित धुंआ रहित सोलर चूल्हे का उपयोग किया जाता है। एशिया के पहले धुंआ रहित गाँव को देखने के लिए सात देशों के आईआईटी के तहत रिसर्च करने वाले छात्र-छात्राएं पहुंचें। गाँव में पर्यावरण संरक्षण और जल संरक्षण के कार्यों को देखकर विदेशी छात्र-छात्राएं काफी प्रभावित नजर आए। उन्होंने ग्रामवासियों की पहल की जमकर सराहना की।
बैतूल जिले का बाचा गाँव एक ऐसा गाँव है जहाँ हर घर में सौर ऊर्जा चलित चूल्हों पर खाना बनाया जाता है। यह एशिया का पहला धुंआ रहित गाँव है। गाँव में हर साल जल महोत्सव भी मनाया जाता है। इस वर्ष जल महोत्सव में सात देशों के 14 विदेशी मेहमानों ने हिस्सा लिया। इसमें जापान, मलेशिया, कजाकिस्तान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, हबई और भारत की आईआईटी मुम्बई के छात्र शामिल हुए। इन छात्रों ने गाँवों में सौर ऊर्जा चलित चूल्हों को देखा। इन ख़ास चूल्हों को भारत भारती शिक्षा समिति के सौजन्य से आईआईटी मुम्बई ने बनाया है। इसके अलावा भी इस गाँव में पर्यावरण संरक्षण को लेकर कई काम किए गए है।
विदेशी छात्रों के अनुसार उन्होंने देखा कि बाचा गाँव में नई और पुरानी तकनीक का किस तरह उपयोग किया जाता है। इन सबके उपयोग से किस तरह पैसे की बचत की जाती है। जल संरक्षण में महिलाएं किस तरह बढ़-चढ़कर भागीदारी निभा रही है। अब वो इस गाँव में किये जा रहे कार्यो को अपने देश के लोगों को भी बताकर उन्हें भी ऐसे कार्यों को करने के लिए प्रेरित करेंगे।
मलेशिया से आईआईटी छात्रा लूर ली ने मैंने यहाँ सौर ऊर्जा का इस्तेमाल करना देखा। किस प्रकार हम नई और पुरानी तकनीक का किस तरह अच्छे से उपयोग कर सकते है। यहां जिस तरह का काम हो रहा है उससे समय और पैसों की बचत हो रही है। मैं अपने देश जाकर अपने अनुभव सभी से साझा करूंगी।
वहीँ दक्षिण कोरिया की उ किम ने बताया कि बाचा गाँव में सोलर लैंप, सोलर चूल्हा और जल संरक्षण पर बहुत बढ़िया काम हो रहा है। खास बात यह है कि ग्रामीण गाँव के विकास में सहभागी होते है। सबसे बढ़िया बात मुझे यहां ये देखनो को मिली कि सभी कामों में महिलाएं बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती है।
आईआईटी मुम्बई से आए छात्र ने बताया कि हम लोग 14 स्टूडेंट है जो 6 अलग अलग देशों ये यहां पर आए हुए है। ये एक एशियन यूनिवर्सिटी एलायंस प्रोग्राम है। जिसके अंडर दूसरे दूसरे देशों से बच्चे आते है और एक दूसरे से सिखते है। एक-दूसरे की यूनिवर्सिटी से सीखते है। इस बार की जो थीम है वो सन सोसायटी और स्टेबिलिटी है। इसलिए हमने बाचा गाँव चुना। सौर ऊर्जा के लिए यहां पर सब लोग मिलकर काम करते है। सभी के सहयोग से होता है। सोसायटी में स्टेबिलिटी लाने के लिए बहुत से काम किये है- जैसे जल सरक्षण। यहां 73 घर है और सभी घरों में सोलर पैनल लगे है। लिखने पढ़ने के लिए एक अच्छा अनुभव सब के लिए है। लीडर अच्छा है जो सब को सीखा रहे है। लोग उनकी सुन भी रहे है क्योंकि उनको फायदे मिल रहे है। यह गाँव दूसरे गांवों से भी अलग है। साफ सफाई भी है।
जिला पंचायत अध्यक्ष सूरज जावलकर ने बताया कि बाचा गाँव से एक नया संदेश मिलता है। गाँव में जल संरक्षण, स्वच्छता, सौर ऊर्जा से जो धुंआ रहित चूल्हा देखने को मिला है। इस गाँव का संदेश जिले के सभी गाँव प्रदेश और देश में जाना चाहिए ताकि सभी जगह ऐसा काम हो सके।
भारत भारती संस्थान के नगर संचालक मोहन ने बताया कि, बैतूल जिले में इस समय विद्या भारती जनजाति शिक्षा एवं भारत भारती संस्थान की ओर से जिले भर में जल महोत्सव कार्यक्रम के आयोजन हो रहे है। इसमें नदी-नालों के बहने वाले पानी को मिट्टी डालकर, पटिया लगाकर, स्टाप डेम बनाकर या बोरी बधाण के द्वारा बहते पानी को रोकने के कार्य किये जा रहे है। आज बाचा गाँव में ये कार्यक्रम था, जिसमे सारे ग्राम के लोगो ने अपने गाँव में बहते पानी को रोक करके जल महोत्सव मनाया। छह देशों के छात्रों के सामने हम लोगो ने बोरी बधाण का कार्य किया जिसमें उन्होंने भी सहयोग किया। गाँव में ऐसे कार्य किस तरह बिना सरकार के सहयोग से होते हैं, यह छात्रों ने देखा। गाँव का पानी गाँव में, नदी का पानी नदी में रोकने के लिए जो कार्य किये है वो भी छात्रों ने देखा। गाँव पूरा स्वच्छ है ये पूरे एशिया का धुआं रहित गाँव बन गया है। इसी को देखने के लिए विद्यार्थी यहां आए हुए है।
