देवास। मध्यप्रदेश के देवास जिले के एक किसान ने पारम्परिक खेती छोड़ बांस की फसल की खेती शुरू की। किसान की मेहनत और सूझबूझ के कारण 6 से 7 वर्ष में आने वाली फसल महज 4 साल में ही तैयार हो गई। अब किसान को बांस की खेती से हर साल एक लाख रुपए प्रति बीघा की आमदनी हो रही है। ख़ास बात यह है कि किसान को अब आने वाले 40 से 45 साल तक बांस की फसल का लाभ मिलता रहेगा।
दरअसल पर्यावरण संरक्षण को देखते हुए बाजार में लकड़ी के विकल्प के रूप में बांस की अच्छी-खासी मांग है। वहीं बांस की फसल की खासियत यह है कि इसे बिना कीटनाशक और खाद के कम से कम पानी में तैयार किया जा सकता है। मध्यप्रदेश के देवास जिले के पीपलरावां में रहने वाले किसान अशोक नाहर भी चार साल पहले अन्य किसानों की तरह सोयाबीन, गेंहू-चने और आलू-प्याज की खेती करते थे। लेकिन अधिक लागत, मेहनत, पानी की कमी और बाजार में उचित मूल्य न मिलने के कारण अशोक ने पारम्परिक खेती छोड़ बांस की फसल की खेती शुरू की।
अशोक ने इन्टरनेट के माध्यम से और नए क्षेत्रों में जाकर कई किसानों से बातचीत की। उन्होंने जुलाई 2016 में अपने 24 बीघा खेत में 20 रुपए प्रति पौधे के हिसाब से एक लाख रुपए के पांच हजार पौधे लगाए। अशोक की मेहनत और सूझबूझ के कारण 6 से 7 वर्ष में आने वाली फसल महज 4 साल में ही तैयार हो गई। चार साल पहले लगाए दो-दो फीट के पौधे आज 40 फीट के हो गए हैं। इससे अशोक को हर साल एक लाख रुपए प्रति बीघा की आमदनी हो रही है। ख़ास बात यह है कि अशोक बांस की फसल से 40 से 45 साल तक लाभ कमाता रहेगा।
अशोक की सूझबूझ को देखते हुए वन विभाग ने उन्हें मास्टर ट्रेनर भी बनाया हुआ है। वह अब तक तीन गाँव के 25 किसानों को बांस की खेती करने की ट्रेनिंग दे चुके हैं। अशोक ने बताया कि बांस की खेती में केवल एक बार पौधे रोपने और सिंचाई करने के अलावा कोई अन्य खर्च नहीं आता है। साथ ही बांस की गुणवत्ता वृद्धि होने के कारण आने वाले वर्षों में 25 से 30 हजार रुपए प्रति बीघा अतिरिक्त लाभ भी होता है।
