इंदौर। पंजाब के बाद अब देश के कुछ और हिस्से भी अब तेज़ी से कैंसर के शिकंजे में कसते जा रहे हैं। कोलकाता के टाटा मेडिकल सेंटर और लन्दन के किंग्स कॉलेज के डॉक्टरों की ताज़ा शोध रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है कि कैंसर का सबसे ज़्यादा खतरे वाले स्थानों में मध्यप्रदेश का मालवा इलाका सबसे ऊपर है. यहाँ हर साल 20 फीसदी तक कैंसर के मरीज बढ़ते जा रहे हैं। देश में 2018 तक कैंसर मरीजों का आंकड़ा साढ़े 11 लाख का है, जो अगले बीस सालों में 2040 तक दुगना हो जाने की आशंका जताई जा रही है।
इस रिपोर्ट के मुताबिक कैंसर का बड़ा खतरा उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, उड़ीसा और राजस्थान को है। कीटनाशकों के प्रयोग में मध्यप्रदेश देश के सर्वाधिक उपयोगकर्ताओं में एक बन चुका है और यही कारण है कि अब अकेले मध्यप्रदेश में कैंसर मरीजों का आंकड़ा तेज़ी से बढ़कर 93 हजार 754 तक पहुँच चुका है। ये आंकड़े केवल सरकारी अस्पतालों के हैं। लेकिन अधिकाँश मरीज इलाज के लिए जिला अस्पतालों की जगह इंदौर, भोपाल, अहमदाबाद, मुम्बई और बडौदा के अस्पतालों की तरफ जाते हैं। इनके अलावा कई मरीज झाड़-फूंक,या देसी इलाज और कुछ तो गाँव में बिना जाँच के ही अपनी मौत का इंतज़ार करते रहते हैं। इनका कोई रिकार्ड कहीं नहीं है। कहीं कैंसर एक्सप्रेस का अगला स्टेशन मध्यप्रदेश तो नहीं होने जा रहा।
कभी ‘डग-डग रोटी, पग-पग नीर’ के लिए पहचाने जाने वाले देश के दिल मध्यप्रदेश का मालवा इलाका इन दिनों एक बड़ी त्रासदी के खौफनाक कहर से रूबरू हो रहा है। यहाँ के कई गांवों में कैंसर की जानलेवा बीमारी इन दिनों बढती ही जा रही है। तम्बाकू और बीडी पीने वालों को यह बीमारी आम है लेकिन यहाँ कई ऐसे लोग भी इस लाइलाज बीमारी के चंगुल में फँस चुके है, जिन्होंने कभी इनका इस्तेमाल नहीं किया। विशेषज्ञों के मुताबिक इसका बड़ा कारण खेतों में प्रयुक्त होने वाला कीटनाशक है।
इंदौर से करीब 15 किमी दूर घने जंगलों और हरे-भरे खेतों के बीच बसा हरसोला करीब नौ हजार की आबादी और अठारह सौ घरों वाला गाँव है। यह आलू और सब्जियों के उत्पादन के कारण पहचाना जाता है। यहाँ के कम स्टार्च वाले आलू विदेशों सहित देशभर में बनने वाली वेफर्स में उपयोग किया जाता है। सरपंच लक्ष्मीबाई मालवीय के मुताबिक यहाँ कैंसर के 35 मरीज थे, जिनमें से 15 की मौत हो चुकी है। खेतों का कीटनाशक बारिश के पानी के साथ जमीन में उतरता है और जमीन के साथ जमीनी पानी के भंडार को भी प्रदूषित करता है। यह साफ़ है कि हरसोला गाँव के ज्यादातर लोग किसान हैं और अपने खेतों में काम करते हैं। सभी मृतक किसी न किसी रूप में किसान ही हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि गाँव में बीते 40 सालों में रासायनिक खादों और कीटनाशकों का इस्तेमाल करीब चार से पाँच गुना तक बढ़ा है। इसी ने हमारे परिवेश में जहर और हवा में कडवाहट घोल दी है। ये बीमारियाँ इन्हीं की देन हैं।
कैंसर फाउन्डेशन इंदौर के डॉक्टरों के मुताबिक इस गाँव में 6400 लोगों की जाँच में 25 कैंसर के मरीज मिले। यह आंकड़ा देखकर डॉक्टर भी चौंक गए. एक लाख लोगों में से अमूमन 106.6 कैंसर के मरीज होते हैं लेकिन यहाँ तो इस अनुपात से बहुत ज़्यादा हैं। करीब पाँच गुना ज़्यादा और यह शोध का विषय है। इसमें सभी तरह के मुँह, गले, स्तन, गर्भाशय, रक्त तथा लीवर कैंसर के रोगी शामिल हैं।
कमोबेश यही स्थिति शाजापुर जिले के अमलाय पत्थर गाँव की है। करीब पौने दो हजार की आबादी और सवा तीन सौ परिवार वाले इस गाँव के हर दसवें घर में कैंसर के मरीज अपनी मौत का इंतज़ार करते मिले। अब तक कैंसर से इस गाँव में 31 मौतें हो चुकी हैं। वर्ष 2012 में पहली बार यहाँ कैंसर के चार मरीज मिले थे। लेकिन इलाज के अभाव में इन चारों की बारी-बारी से मौत हो गई. इलाके में कैंसर के कई मरीज हैं लेकिन इनमें ज्यादातर झाड-फूंक के अंधविश्वास में अस्पताल पहुँचते इतनी देर कर देते हैं कि उनका मौत से बचना नामुमकिन हो जाता है। बीते छह महीनों में ही चार लोगों की मौतें हो चुकी है।
ग्रामीण रूपसिंह बताते हैं-“कैंसर मरीजों में बुजुर्ग ही नहीं महिलाएँ और बच्चे भी शामिल हैं। इनमें अधिकांश कोई नशा नहीं करते थे। अलग-अलग तरह के कैंसर से पीड़ित लोगों के लिए आसपास के अस्पतालों में इलाज के लिए सुविधाएँ नहीं हैं तथा इंदौर या भोपाल के कैंसर अस्पतालों में लंबे वक्त तक रहकर इलाज करा पाना उनके बस में नहीं है। यही वजह है कि कैंसर होने पर सिवा मौत के इंतज़ार के अलावा इनके पास कोई चारा नहीं है। यहाँ कैंसर का खौफ इस तरह तारी है कि लोग यहाँ के कुआँरे लडकों के लिए अपनी लडकियों का हाथ देने तक में कतराते हैं। गाँव का नाम सामने आते ही वे मुँह बिदका लेते हैं। अमलाय में 18 से 40 साल के करीब 60 युवक ऐसे हैं, जो अपनी शादी के इंतज़ार में बुढापे की तरफ बढ़ते जा रहे हैं।”
नवंबर 2012 में गाँव के सभी 13 जलस्रोतों की जाँच की गई थी लेकिन इसकी रिपोर्ट अब तक ग्रामीणों को नहीं बताई गई है। जवाहर कैंसर हॉस्पिटल भोपाल के शोध विशेषज्ञ डॉ गणेश ने बताया कि गाँव के पानी, जमीन, खादों और कीटनाशकों के उपयोग की स्थिति, धूम्रपान, गुटखा तम्बाखू की लत, जीवन शैली, खानपान के तौर तरीकों सहित कई आयामों से शोध के बाद ही अमलाय में इतनी बड़ी तादात में हो रही बीमारी के कारणों का खुलासा हो सकता है लेकिन हाँ खेतों में कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग इसे बढ़ा सकता है। गाँवों में यही बड़ा कारण हो सकता है। जिले के स्वास्थ्य अधिकारी डॉ जीएल सोढी का कहना है कि गाँव के लोग कैंसर के प्रति गंभीर नहीं हैं।
करीब 6 हजार की आबादी वाले धार जिले के डेहरी गाँव में बीते दो सालों में कैंसर से 12 लोगों की मौतें हो चुकी हैं। डेहरी और के आसपास के पाँच गाँवों में बीते महीने 25 मरीज मिले हैं। बीते एक साल में कैंसर से खेमाजी सिर्वी, दामोदर राठौर, गणेश राठौर, बाबू खान और रफीक खान की मौत हो चुकी है। इसी तरह बीते हफ्ते ही पूर्व सरपंच दुर्गाबाई कुशवाह की भी मौत हो चुकी हैं।
सरपंच शकुंतलाबाई जामोद बताती हैं “गाँव में कैंसर का प्रकोप बढने के बाद एक बार फिर पीने के पानी की जाँच ज़रूरी हो गई है। इससे पहले भी पंचायत के प्रस्ताव पर लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने पानी का सैम्पल तो लिया लेकिन इसके गुणवत्तापूर्ण होने या नहीं होने की कोई रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है। यदि विभाग के अधिकारी पानी को दूषित बताएँगे तो हम तुरंत इसकी सप्लाय रोक देंगे।”
पूर्व सरपंच जफरुद्दीन मुलतानी बताते हैं-“कैंसर के साथ गाँव में कई तरह की बीमारियाँ व्याप्त हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है पीने का पानी। यहाँ के पानी में पहले बभी फ्लोराइड का आधिक्य मिला था लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। पुरानी रिपोर्ट में तीन प्रतिशत फ्लोराइड होने से कुछ स्रोतों का पानी बंद कर दिया था लेकिन कुछ ही दिनों में लोगों ने फिर से पीना शुरू कर दिया। एक प्रतिशत से अधिक होने पर पानी पीने योग्य नहीं रहता। कुछ लोगों को इससे किडनी, लीवर, खुजली, चर्म रोग, घेंघा और दांत पीले और टेढ़े होने के साथ अन्य बीमारियाँ हो रही हैं। फिलहाल चार ट्यूबवेल से लोगों को पानी दिया जा रहा है। धार जिले में केंद्र सरकार का कैंसर, मधुमेह और ह्रदय रोग जैसे गैर संचारी रोगों के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम भी चलाया जा रहा है।”
धार के ही पड़ोसी जिले खंडवा में बीते एक साल में कैंसर से 31 मौतें हो चुकी हैं। इस साल यहाँ 283 नए कैंसर रोगी दर्ज़ हुए हैं। झाबुआ जिले के गाँवों में भी यही स्थिति है। बीते तीन साल में यहाँ करीब 30 मरीजों की मौत हुई है तथा 240 से ज़्यादा नए मरीज दर्ज़ हुए हैं। अलीराजपुर में 223 दर्ज़ हैं। रतलाम में 172 कैंसर पीड़ित हैं। खरगोन में चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है, जहाँ कुल 290 मरीजों में 62 फीसदी महिलाएँ शामिल हैं। देवास में बीते चार सालों में 934 मरीज़ दर्ज़ हैं। मंदसौर में तीन सालों में कैंसर पीड़ितों का आकंडा 33 से बढ़कर 209 तक पहुँच गया है। उज्जैन में सर्वाधिक 2787 मरीज दर्ज हैं, इनमें 30 फीसदी स्तन कैंसर पीड़ित महिलाएँ हैं। उज्जैन का कैंसर अस्पताल इलाके में माडल के रूप में माना जाता है।
अधिक से अधिक उत्पादन की होड़ में गाँव के आसपास खेतों में इतनी बड़ी तादात में कीटनाशकों का इस्तेमाल किया गया है कि कई गांवों की धरती और पानी दोनों ही जहरीले हो चुके हैं। रासायनिक खाद के इस्तेमाल में भी मध्यप्रदेश पीछे नहीं है। देश में सबसे ज़्यादा यूरिया की खपत करने वाले प्रदेशों में मप्र तीसरे नंबर पर हैं। पहले नंबर पर उत्तर प्रदेश है, जो क्षेत्रफल की दृष्टि से काफी बड़ा है। छत्तीसगढ़ का क्षेत्रफल काफी कम होने के बावजूद यहाँ भी यूरिया की खपत काफी बड़ी तादात में हुई है। इसमें हर साल 20 फीसदी बढ़ोतरी हो रही है। जाहिर है कि किसान यूरिया का बेतहाशा उपयोग कर रहे हैं। यहाँ तक कि खेतों की मिट्टी का परीक्षण किए बिना मनमाने तरीके से यूरिया सहित अन्य खादों का प्रयोग किया गया। यूरिया का 30 फीसदी हिस्सा ही पौधों को बढ़ाता है, जबकि बड़ा हिस्सा 70 फीसदी नाइट्रोजन में बदलकर बारिश के पानी के साथ धरती में जाकर भूजल भंडार तथा मिट्टी को प्रदूषित करता है। नदी-नालों में पहुँचा ऐसा पानी जलीय जंतुओं के लिए आक्सीजन की कमी से उनके जीवन पर संकट आता है। यह पानी और इससे उगने वाला अन्न दोनों ही मनुष्य की सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं और गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं।
बीते बीस सालों से पर्यावरणविद और कृषि वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि जल्दी ही रासायनिक खादों और दवाओं को हटाकर जैविक खेती को नहीं अपनाया गया तो हालात गंभीर हो सकते हैं, फिरभी अब तक जैविक खेती को लेकर सिर्फ़ नारेबाजी ही हो रही है। हमारे यहाँ जैविक खेती की अवधारणा नई नहीं है, परम्परा से हमारे पूर्वज इसे करते रहे हैं। आसन्न चुनौतियों से निपटने का एकमात्र विकल्प है-अपनी जड़ों की ओर लौटना। हमें फिर परम्परागत खेती के तरीकों पर आना होगा। अब इसे रोकने का समय आ गया है। यह जमीन और स्वास्थ्य दोनों के लिए हानिकारक है और पैसों की बर्बादी भी है।
