झाबुआ। एक बीमारी क्या समाज में इतनी नफरत पैदा कर सकती है कि लोग डर के मारे अपने परिजनों को ही जिंदा दफनाने और घर से बेदखल करने पर आमादा हो जाए। दरअसल पिछड़े इलाकों में लोग इस बीमारी को सामाजिक बुराई मानकर लोकलाज के डर से ऐसा घिनौना कदम उठा रहे हैं। मध्यप्रदेश के झाबुआ इलाके की एक लड़की की दास्तां सुनकर आप की रुह कांप जाएगी। छोटी सी उम्र में एक लड़की ने अपने पिता और चाचा की बात सुनी तो उसके होश उड़ गए। पिता औऱ चाचा इस बीमारी से पीड़ित लडकी से छुटकारा पाने के लिए उसे जिंदा गाड़ने की योजना बना रहे थे। लडकी ने अपनी मां को इस बारे में बताया तो वह लड़की को चुपचाप ऐसी जगह छोड़ आई जहां अब उसे जिंदगी मिल गई। इलाके में यह कहानी सिर्फ झींगू की नहीं है बल्कि कई लोगों की है।
22 साल की झींगू भी कभी आम बच्चों की तरह अपने घर परिवार में रह रही थी। झींगू धार जिले के कपसी गाँव में रघुनाथ और शायदा की बेटी है। अचानक उसकी उंगलियां गलने लगी। डॉक्टर ने जांच के बाद उसे कुष्ठ रोग होना बताया। यह सुनने के बाद परिवार ने उससे छुटकारा पाने की कोशिश की। एक दिन झींगू ने अपने पिता और चाचा के बीच उसे लेकर चल रही बातों को सुना तो वह बुरी तरह डर गई। दरअसल झींगू के पिता औऱ चाचा उसे जिंदा दफनाने की योजना बना रहे थे। इस इलाके में आज भी कुष्ठ रोग को बीमारी नहीं बल्कि एक सामाजिक बुराई की तरह समझा जाता है। जिस परिवार में कुष्ठ रोगी होता है उसे तिरस्कार झेलना पडता है। समाज में शादी ब्याह के लिए इस परिवार को अलग-थलग कर दिया जाता है। झींगू का पिता रघुनाथ नहीं चाहता था कि वह परिवार पर दाग साबित हो। इसलिए वह इस घिनौनी करतूत को अंजाम देने वाला था। दौड़ कर झींगू अपनी मां के पास गई और पिता की बात बताई। झींगू की मां उसे राणापुर स्थित करुणा सदन के गेट पर चुपचाप छोड़ गई। करुणा सदन के स्टाफ ने झींगू की परवरिश की। झींगू के लिए अब यही करुणा सदन उसका घर बार है। करुणा सदन में ही एक पीड़ित से उसकी शादी भी कर दी गई है। अब उसके दो छोटे-छोटे बच्चे हैं।
झींगू ने बताया कि उसे यहां छोड़कर जाने के बाद मां एक बार मिलने आई थी। पिता की मौत हो गई है। वह चाहती है कि उसके साथ जो कुछ हुआ वह किसी और के साथ ना हो। वह अपने पिता को कभी माफ नही करेगी। मां उसे करुणा सदन छोड़कर नहीं जाती तो शायद आज वह किसी कब्र में बंद होती।
ताजा मामला घिसिया बाई का है। 80 साल की यह बुजुर्ग भी कुष्ठ रोग की शिकार है। जब घर वालों को उसके बारे में पता चला तो उन्होंने पहले तो उसे खाना देना बंद कर दिया और फिर उसे बेघर कर दिया। करुणा सदन की सिस्टर पुलेरिया का कहना है कि उनके यहां 25 मरीज है। सभी मरीज यहां एक परिवार की तरह रहते हैं। हैरानी की बात यह है कि इस इलाके में आज भी कुष्ठ रोगियों को अछुत तो माना ही जाता है लेकिन साथ में इस बीमारी को सामाजिक बुराई भी मानी जाती है। इस बीमारी से पीड़ित मरीज के परिवार में और यहां तक की उसकी अगली पीढ़ियों में भी कोई शादी ब्याह नहीं करता।
कुष्ठ रोग अब लाइलाज बीमारी नहीं है। यह संक्रमण के जरिए जरुर फैलती है लेकिन इसे समाजिक बुराई कतई नहीं माना जा सकता। जरुरत इस बात की है कि लोगों को इसके लिए जागरुकर कर भ्रांतियों को दूर किया जाए।
