खरगोन। प्रदेश की खरगोन नगर पालिका ने पर्यावरण प्रदूषण कम करने और शहर के कचरे का निपटान करने की नायाब पहल शुरू की है। दरअसल नगर पालिका ने कचरे के वेस्ट से इको फ्रेंडली ईट बनाना शुरू किया है। इससे पर्यावरण प्रदूषण भी कम होगा और मिट्टी की भी बचत होगी। ख़ास बात यह है कि कचरे से बनी ईट दूसरी ईंटों की तुलना में मजबूत भी है और सस्ती भी।
बता दे कि खरगोन नगर पालिका देश की पहली ऐसी नगर पालिका है जो कचरे के वेस्ट से ईंटों का निर्माण करवा रही है। कुंदा नदी के किनारे कुम्हार हाथ से और मशीन से ईंटों का निर्माण कर रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग कचरे से बनी ईट को देखने के लिए पहुँच रहे हैं। इस ईट की खासियत यह है कि गर्मी के मौसम में 47 से 48 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी यह घर को ठंडा रखेगी।
खरगोश शहर में रोजाना करीब 47 टन कचरा निकलता है। गीले कचरे से खाद बनाने के बाद करीब 2 टन वेस्ट निकलता है। कचरे का वेस्ट नगर पालिका के लिए अनुपयोगी रहता था, लेकिन अब नगर पालिका ने इसका भी उपयोग करना शुरू कर दिया है। पहले ईट बनाने वाले कुम्हार भूसा और अन्य सामग्री के साथ 25% चिकनी मिट्टी मिलाकर ईट बनाते थे। लेकिन अब 25% मिट्टी की जगह कचरे के बेस्ट का उपयोग किया जा रहा है।
नगर पालिका की इस पहल से कुम्हारों को नर्मदा किनारे से चिकनी मिट्टी लाने की समस्या और खनिज विभाग की कार्यवाही का डर भी खत्म हो गया। खरगोन में कचरे के वेस्ट से रोजाना 3000 से अधिक ईटर तैयार की जा रही है। नगरपालिका खरगोन का दावा है कि गर्मी के मौसम में 47 से 48 डिग्री सेल्सियस तापमान से परेशान हो रहे लोगों के लिए इस ईट से बने भवन राहत पहुंचाएंगे।
नगर पालिका खरगोन के मुख्य नगर पालिका अधिकारी निशीकांत शुक्ला ने बताया कि स्वच्छता के क्षेत्र में नगर पालिका देश में नंबर वन है। रोजाना दो से तीन टन कचरा निकलता है। कचरे से जो वेस्ट निकल रहा था। उसका हमने ईट निर्माण शुरू करा है, जो प्रदूषण की दृष्टि से बेहतर है। ये सस्ती भी है और जो कुम्हार चिकनी मिट्टी का उपयोग करते थे। उसकी जगह ईट बनाने में इस वेस्ट का उपयोग करेंगे। यह ईट सस्ती भी पड़ रही है और मजबूत भी है। साथ ही इको फ्रेंडली भी है, इससे खरगोन में मजबूत इमारतें तैयार होगी।
वहीँ ईट बनाने वाले कुम्हार दानिश शेख का कहना है कि पहले हम काली मिट्टी, लाल मिट्टी और गन्ने का भूसा मिलाकर ईट तैयार करते थे। अब नगरपालिका द्वारा तैयार की गई खाद के वेस्ट से ईट तैयार कर रहे हैं। इससे जो ईट बन रही है, वो काफी मजबूत है और यह इको फ्रेंडली भी है। इससे नदियों के किनारे मिट्टी का जो कटाव होता था वो नहीं होगा। इसके पकाई में भी कम इधन कम लगेगा। हमें ये फायदेमंद लगा इसलिए रोजाना पांच से सात हजार ईट बना रहे हैं।
