नरसिंहपुर। एक समय था जब अनाज या मसाला पीसने के लिए लोग सिलबट्टे और पत्थर की चक्की का इस्तेमाल करते थे। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में इनकी जगह अब मिक्सर ग्राइंडर जैसे उपकरणों ने ले ली है। इस कारण सिलबट्टे और पत्थर की चक्की तराशने वाले कारीगरों के सामने रोजगार का संकट आ खड़ा हुआ है। आज यह कारीगर अपना पुश्तैनी धंधा छोड़कर पलायन करने पर मजबूर हैं।
कुछ सालों पहले हर घर में सिलबट्टे और पत्थर की चक्की हुआ करती थी। लेकिन आधुनिक तकनीक के दौर ने घरों से इन्हें गायब कर दिया है। इस कारण इन्हें बनाने वाले मेहनतकश कामगार पलायन को मजबूर है। नरसिंहपुर जिले के बरमान में कुछ परिवार पिछली कई पीढ़ियों से बेजान पत्थरों को अपनी आजीविका का साधन बनाए हुए है। ये परिवार सिलबट्टे और पत्थर की चक्की तराशकर अपना गुजर-बसर किया करते थे। लेकिन आज इस काम से यह बमुश्किल दो वक्त की रोटी कमा पाते है। इनकी आजीविका के खरीददार भी अब ग्रामीण इलाकों के लोग रह गए है।
दरअसल मिक्सर ग्राइंडर जैसे उपकरणों से त्वरित खाद्य की आपूर्ति तो हो जाती है लेकिन सिलबट्टे से पिसा हुआ मसाला सुगंधित महक के साथ आपके खाने को भी जायकेदार बना देता है। आज गांवों के कुछ लोग सिलबट्टे और पत्थर की चक्की से बनने वाले खाद्य के जायके की समझ रखते हैं। वहीँ लोग दूर दूर से इन्हें खरीदने आते है। वहीँ शहरों में तो सिलबट्टे और पत्थर की चक्की का चलन लगभग समाप्त हो चुका हैं। इस कारण इन्हें बनाने वाले कारीगरों को पुश्तैनी रोजगार छोड़कर पलायन करना पड़ रहा है। आज इन कारीगरों की सुध लेने वाला भी कोई नहीं है।
