बडवानी, द टेलीप्रिंटर। शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले… गाते हुए शहीदों का मान बढ़ाने वाले समाज में आज कई जगह देश की आज़ादी के दीवानों के स्मारक अव्यवस्थाओं का शिकार बन चुके हैं। इनमें निमाड़ के राबिनहुड कहे जाने वाले भीमा नायक का स्मारक भी शामिल है। यहाँ स्मारक के आसपास इतनी बड़ी तादात में घास फ़ैल गई है कि स्मारक ही दिखाई नहीं देता। न यहाँ शाम के समय रोशनी का इंतजाम है और न ही कोई देखरेख।
मध्यप्रदेश में स्थित बडवानी के पास सन 1857 में अंग्रेजों के छक्के छुडा देने वाले आदिवासी समाज के स्वाधीनता सेनानी भीमा नायक का स्मारक सरकार ने लाखों रूपये की लागत से उनके गाँव धाबाबावरी में प्रेरणा केंद्र के रूप में निर्मित किया है। इसे बने अभी महज कुछ साल ही बीते हैं लेकिन साल में एक दिन भीमा नायक की स्मृति में आयोजन के समय सब कुछ चाक चौबंद होता है और आयोजन के बाद पूरे साल यहाँ अव्यवस्थाएँ पसरी पड़ी रहती हैं।
ढाई साल पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने चार काबिना मंत्रियों के साथ 21 जनवरी 2017 को इस आदिवासी योद्धा के स्मारक का उदघाटन किया था। स्मारक में तीन हाल है, जिसमें एक में शहीद भीमा नायक की प्रतिमा तथा बाकी दो में उनके युद्ध कौशल के 42 चित्र लगे हैं। परिसर में एक चबूतरा और सुंदर बगीचे के अलावा पौधो को पानी देने के लिये फाउन्टेन, चौकीदार निवास और प्रसाधन सुविधाएँ आदि हैं। स्मारक की देखरेख का जिम्मा पहले नगर पंचायत बडवानी को सौंपा गया था लेकिन बाद में इसे बदलकर आदिम जाती कल्याण विभाग को सौंप दिया गया।
आज हालत इतनी खराब है कि बिजली नहीं होने से इसे देखने आने वाले भीतर के हाल में स्थित चित्र ही नहीं देख पाते। यह परिसर रोशनी नहीं होने से रातभर अँधेरे में डूबा रहता है। यही हाल रहा तो यह असामाजिक गतिविधियों का केंद्र बन सकता है। पूरे परिसर में सुंदर बगीचे की जगह ऊँची-ऊँची घास उग आई है। इससे भीतर स्मारक तक जाने में भी डर लगता है। पानी की व्यवस्था के लिए यहाँ चार बोर करवाए गए लेकिन एक में भी पानी नहीं निकला तो उसी बावड़ी से पाइप लाइन डाली गई, जो कभी खुद भीमा नायक ने बनवाई थी। महीनो से पानी के स्त्रोतो पर लगी पानी की मोटर चोरी हो चुकी है। चौकीदार को भी पीने का पानी अन्यत्र से लाना पडता है। परिसर में चौबीस घंटे के लिये मात्र दिन हेतु चौकीदार है, परिसर हेतु रात में कोई चौकीदार नहीं है। भीमा नायक की मूल गढी धाबाबावरी की पहाडी पर आज भी स्थित है, सरकार ने उस और न तो ध्यान दिया नहीं कोई कार्य हुआ, उपर जाने तक का मार्ग कच्चा है। मूल गढी पर कोई कार्य नहीं हुआ है।
शहीद भीमा नायक को निमाड के राबिनहुड के नाम से भी जाना जाता है जो अंग्रेजों से लूटा हुआ धन गरीबो में बांट देते थे। 1857 की क्रांति में अंग्रेजो के पसीने छुडा देने वाले इस योद्धा के लिये मप्र सरकार ने पीजी कालेज बडवानी और लोअर गोई परियोजना का नाम रखकर तथा यह स्मारक बनाकर अपने कर्तव्य की पूर्ति कर ली है।
निमाड सहित पूरे देश के आदिवासी समाज में सम्मान के साथ लिये जाने वाले नामो में एक शहीद भीमा नायक बडवानी के निकट ग्राम धाबा बावरी के निवासी थे और देश की आजादी में अपना योगदान देने वाले निमाड के अग्रणी योद्धा थे। भीमा नायक पर कई विद्वानों ने शोध किया। समाज विज्ञानी डा.एम.एल.वर्मा निकुंज ने अपनी किताब में भीमा नायक के युद्व कौशल से परिचित कराते हुए लिखा है कि वे गौरिल्ला युद्ध कला में पारगंत थे, मतलब छिपकर युद्ध करने की कला। वही किताब में इस बात का भी जिक्र है कि उनका कोई भी वास्तविक चित्र उपलब्ध नहीं है, जितने भी चित्र है वे सब काल्पनिक एवं स्केच चित्र है।
भीमा नायक की 1857 में तात्या टोपे से निमाड में मुलाकात की बात भी सामने आई है और यह भी कि उन्होने तात्या टोपे को नर्मदा नदी पार करवाने में मदद की थी। भीमा नायक का कार्यक्षेत्र बडवानी रियासत से लेकर महाराष्ट्र के खानदेश तक था। उन्होंने अपने डेढ़ सौ साथियो के साथ मण्डलेश्वर जेल को तोडने की योजना बनाई थी लेकिन उन्ही के एक सहयोगी की मुखबिरी से उन्हे गिरफ्तार कर अंग्रेजो ने सजा के तौर पर पोर्ट ब्लेयर जेल में रखा। उनके मृत्यु प्रमाण पत्र पर 29 दिसम्बर 1876 की तारीख अंकित है। उनके मृत्यु प्रमाण पत्र को लाने में स्थानीय भीमा नायक कालेज के इतिहास के विघार्थियो और स्टाफ ने काफी मेहनत की। उन्होंने अपने जीवनकाल में चार बावडियो का निर्माण करवाया, जो आज लगभग दो सौ साल बाद भी बिना किसी संधारण के वैसे ही खडी है जैसे उनका निर्माण अभी-अभी करवाया गया हो।
इनका कहना है कि–
“हमने स्मारक का निर्माण कर उसे हैण्डओवर कर दिया है।”
राजेन्द्र मुजाल्दे, इंजीनियर, लोक निर्माण विभाग
“आपने स्मारक पर बिजली पानी और घास की समस्या से अवगत कराया है तो मैं जल्दी ही इस सम्बन्ध में कलेक्टर से बात करूँगा।”
प्रेमचन्द पटेल, विधायक, बडवानी
“सरकार ने हमारी माँग पर ही भीमा नायक और टंट्या मामा को शहीद का दर्जा दिया है। स्मारकों पर खर्च की गई राशि का सही उपयोग होना चाहिए. परिसर को साफ़-सुथरा तथा आने-जाने वालों के लिए बिजली-पानी जैसी सुविधा का पूरा ख्याल रखा जाना ज़रूरी है। हम प्रयास कर रहे हैं कि ख्याजा नायक को भी शहीद का सम्मान मिले। इलाके के अन्य आदिवासी सेनानियों के बारे में भी हम जानकारी जुटा रहे हैं।”
गजानंद ब्रहाम्णे, अध्यक्ष, मप्र आदिवासी एकता परिषद
