बडवानी। यह सैलाब सब कुछ डूबो देने पर आमादा है। सरदार सरोवर डूब क्षेत्र में पानी का जो सैलाब उमड़ रहा है, इसमें आम जान माल के साथ-साथ देवताओं के धाम, मन्दिर, चबूतरे, आश्रम, घाट और पेड़ सब कुछ डूब जाएगा। सैकड़ों सालों से इंसानी आस्था में चाहे इन्हें देवता होने का मान मिलता रहा हो लेकिन डूब के दर्द से ये भी अछूते नहीं हैं। इस इलाके में सैकड़ों छोटे-बड़े मन्दिर और अन्य स्मारक अब इतिहास में तब्दील होते जा रहे हैं। पानी के लगातार बढ़ते जल स्तर से एक के बाद एक धरोहरें डूबती जा रही हैं।
कभी जहाँ सुबह-शाम प्रार्थानाओं के गीत और आरती के घड़ी घंटालों की आवाजें गूँजती रहती थी, अब उन्हीं मन्दिरों के आसपास खौफ का सन्नाटा पसरा पड़ा है। जिनसे कभी लोग अपने दुःख-तकलीफों से पार पाने का हौंसला जुटाते रहे, आज वे देवता के धाम ही डूब रहे हैं। ये उन-उन गाँवों में एक हजार साल से सौ-दो सौ साल पहले से यहाँ के लोगों की जन आस्था से जुड़े रहे हैं लेकिन अब इन्हें इतिहास में बदलने से कोई नहीं रोक पा रहा। नर्मदा नदी के किनारे ऐसे सैकड़ों स्थान हैं जो अब तक अपनी रमणीकता और आस्था के लिए जाने जाते हैं।
धार जिले के कुक्षी में गांगली गाँव का प्राचीन नंदेश्वर महादेव का मंदिर डूब रहा है, इसका उल्लेख नर्मदा पुराण और शिवमहापुराण में भी मिलता है। आज से 9 साल पहले 2010 में यहाँ से प्रतिमा को अन्यत्र स्थापित किया जा चुका है लेकिन मन्दिर और उसके पास बने गंगा कुंड को डूबते हुए देखना हर किसी की आँखों की कोर भींगो गया। प्रतिमा को तो अन्यत्र भेज दिया लेकिन गंगा कुण्ड को कोई किस तरह ले जा सकता है। हर साल गंगा दशहरे पर यहाँ बड़ा मेला भरता था और दूर-दूर से यहाँ लोग स्नान के लिए आते थे। मान्यता है कि साल में इसी दिन एक बार गंगा खुद नर्मदा से मिलने आती है लेकिन अब गंगा कैसे मिलेगी नर्मदा से। वे लोग कहाँ जाएँगे जो बीमारियों के इलाज के लिए सालों से इस कुंड में स्नान करते रहे। शिवमहापुराण में भी पृष्ठ 526 पर गंगा कुंड का उल्लेख मिलता है।
इसी तरह बोधवाड़ा का देवपथ महादेव मंदिर भी डूब में है। इसमें अभी तक मूल स्थान पर ही प्रतिमा है और पुजारी को यहाँ पूजा करने के लिए नाव से जाना पड़ रहा है। पुराणों के अनुसार कहा जाता है कि समुद्र मंथन के बाद देव-दानवों की लडाई में शंकरजी विषपान कर मैकाल पर्वत पर जा पहुँचे। भगवान शिव की पुत्री मानी जाने वाली रेवा (नर्मदा) का उद्गम भी इसी पर्वत श्रृंखलाओं से हुआ है। देवताओं ने शिव को ज़हर पिलाने का भान हुआ तब उन्होंने प्रायश्चित स्वरूप बोधवाडा में स्नान कर उनकी परिक्रमा कर उनसे क्षमा याचना की थी। देवताओं को अपनी गलती का बोध हुआ, इसीलिए इस जगह का नाम बोधवाडा पड़ा था। बताया जाता है कि यह देश का एकमात्र मन्दिर है, जिसकी स्थापना रूद्रयंत्र पर हुई है और इसके गुम्बद में बीसा यंत्र है।
आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया ने डूब प्रभावित जिन महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक मन्दिरों को शामिल किया है, उनमें धार जिले की मनावर तहसील के एकलरा का एक हजार साल पुराना शिव मन्दिर तथा सौ साल पुराने अन्य चार मन्दिर भी शामिल हैं। इसी तरह कुक्षी तहसील में कवठी गाँव के सौ साल पुराने कृष्ण और हनुमान, गांगली का एक हजार साल पुराना नंदेश्वर, बोधवाड़ा का 700 आल पुराना देवपथ मन्दिर, मलवाडा का डेढ़ हजार साल पुराना बोदेल बाहू का मन्दिर, चिखल्दा के 900 साल पुराने नीलकंठेश्वर और हरेहरश्वर मन्दिर, डेहर गाँव के 300 साल पुराने मन्दिर, कोटेश्वर में दो हजार साल पुराना राम मन्दिर और महादेव मन्दिर भी शामिल हैं।
बडवानी जिले के भी पीपलूद के 200 सल पुराने चार बड़े मन्दिर, बगुद में चार मन्दिर, उचावद में दो, पीपरी में पांच, भीलखेडा में दो हजार साल पुराने शिव मन्दिर सहित पांच मन्दिर, छोटी कसरावद में दो हजार साल पुराने मोजेश्वर सहित तीन मन्दिर और राजघाट में सौ साल पुराने दत्त मन्दिर सहित चार मन्दिर भी डूब चुके हैं या कगार पर हैं।
ये सूची तो केवल बड़े मन्दिरों की है। इसमें लोक देवताओं के चबूतरे और छोटे मन्दिरों का तो कहीं अता पता भी नहीं है न उनका कोई पुनर्वास होगा। लोक के देवी देवताओं की कहानियाँ तो अब किस्सों में ही रह जाएगी। इसके अलावा कई मस्जिदें भी डूब जाएंगी।
इस तरह सरदार सरोवर के इस सैलाब में लोग ही नहीं कई भगवान भी बेघर हुए जा रहे हैं।
