May 9, 2026

डिस्टाइन्ड टू डाईंग:मृत्युशैय्या पर 11 सौ जिंदगियां

झाबुआ। मांडली का शैतान मन्नू सूख कर कांटा हो चुका है। हाड ऐसा की एक-एक हड्डी गिनी जा सके। थोड़ा सा बैठने भर में ही सांस चलने लगती है और शरीर में तेज दर्द होने लगता है। डॉक्टर ने इलाज के लिए हाथ खडे कर दिए हैं। किस पल सांस थम जाए और मौत आ जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। पूरा परिवार भी शैतान को अब जिंदा लाश ही मानता है। शैतान सालों पहले पेट की खातिर मजदूरी के लिए गुजरात गया था। कुछ ही महीनों में पत्थर पिसाई के दौरान उडने वाली धूल फेफड़ों में सिमेंट की तरह जम गई।

कलिया वीरान गाँव की 7 साल की गंगा अपने छोटे-छोटे भाई-बहनों के साथ अकेली रहती है। उसके माता-पिता पांच सालों के भीतर बारी-बारी से चल बसे। इन्ही बच्चों की पेट की आग बुझाने के लिए कालू और दीनू अपने इन्हीं बच्चों के लिए गुजरात की कांच बनाने वाली फैक्ट्रियों में मजदूरी करने गए थे। सिलिकोसिस से पीड़ितहोने के बाद पति-पत्नी दोनों धीरे-धीरे सूखते गए और एक दिन उनकी सांसे थम गई। बच्चे अनाथ हो गए। इनकी परवरिश करने वाला कोई नहीं। थोडी सी जमीन और बडे भाई-बहन छोटी-मोटी मजदूरी कर अपने पेट भर रहे हैं।

कलिया विरान गाँव का ही 50 वर्षीय राजमल ना मजदूरी कर पाता है ना घर का कोई काम। फेंफडे जवाब दे चुके हैं। फेफड़े पत्थर में तब्दील हो गए हैं। उपर से फेफड़ों की हड्डियां दिखाई दे रही है लेकिन भीतर सब कुछ खत्म हो चुका है। डॉक्टरों ने साफ कह दिया है जितने दिन जी जाओ उतनी तुम्हारी किस्मत। राजमल कई दिनों तक दाहोद के अस्पताल में भर्ती रहा। थोडे दिन बाद फिर गाँव आ गया। यहां मजदूरी भी नहीं मिलती थी। मजदूरी के लिए दाहोद जाना पडता है। दो छोटे-छोटे बच्चे हैं। दो बीघा जमीन है। दूसरे लोग कुछ बो देते हैं। जो कुछ मिलता है। उसी से परिवार पेट भर लेता है। सरकार की तरफ से सिवा सिलिकोसिस पीड़ितहोने के प्रमाण पत्र के अलावा कुछ नहीं मिला। भिलू गजावा की पत्नी भंगु का पति भी पिछले साल चल बसा। भंगु भी सिलिकोसिस से पीड़ितहै। उसकी जिंदगी भी अब ज्यादा दिन की नहीं है। अपने पति और खुद का सिलिकोसिस पीड़ितहोने का प्रमाण पत्र लेकर यहां-वहां भटकती रहती है लेकिन फिलहाल कोई मदद नहीं मिल रही। इलाज के नाम पर सरकारी दवाखाने से कुछ गोलियां मिल रही है। बस इन्हीं के भरोसे आस बंधी है।

बद्दू भी भंगु की तरह अभागी औरत है। पति की सिलिकोसिस ने जान ले ली। उमरदरा गाँव की रहने वाली बद्दू के घर फाके के हालात है। बद्दू खुद भी इस बीमारी से पीड़ितहैं।

कषलदरा के रहने वाले दिनेश रायसिंग पिछले साल खटिया पकड चुके थे। दिनेश साल 2002-03 में गुजरात के गोधरा और दाहोद में पत्थर पिसाई की मजदूरी के लिए गया था। पत्थर पिस कर तैयार किए पावडर से कांच बनाया जाता है। एक बोरी यानी 20 किलो की बोरी के बदले 50 रुपए मिलते थे। यहां काम नहीं था इसलिए पलायन कर वहां जाना पडा। दो-तीन महिनों में ही हालत खराब हो गई। वहां से तो कुछ ही महीनों में लौट आए लेकिन जिंदगी भर की बीमारी का दर्द हमेशा-हमेशा के लिए साथ ले आ गया। सांस चलती है। खांसी आती है। थोडा भी मेहनत का काम नहीं हो पाता। 35 साल की उम्र है। दो छोटे-छोटे बच्चे हैं। मौत हर दिन मंडराती है। किस दिन जिंदगी का पहिया थम जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। दिनेश सिलिकोसिस पीडितों की लडाई भी लड रहे हैं।

यह त्रासदी इतनी भयावह है कि सिलिकोसिस से पीड़ितजिन लोगों की मौत हो जाती है। उन्हें जलाने के बाद हड्डियों के साथ फेफंडेंनुमा कांच का चमकीला पत्थर निकलता है।

मध्यप्रदेश का आदिवासी बाहुल्य इलाका धार, झाबुआ और अलीराजपुर में हर साल बडी संख्या में रोजगार की तलाश में आदिवासी पलायन कर पडोसी राज्य गुजरात जाते हैं। डेढ दशक पहले कई गाँवों से बडी संख्या में आदिवासी कांच बनाने के लिए पत्थर की पिसाई करने वाले कारखानों में गए थे। यहां पिसाई के दौरान बारिक धूल कण सांस में घूल कर फेफड़ों में जमा हो गए। यह धूल सिमेंट की तरह फेफड़ों में चिपक गई। आदिवासियों को इस गंभीर बीमारी के बारे में पता चला तब तक कई लोग इसकी चपेट में आ चुके थे। तीन जिलों के 105 गाँवों में अब तक 589 लोगों की मौत हो चुकी है। 1132 लोग बीमारी से पीड़ितहैं। इस बीमारी से कुल 1721 लोग प्रभावित हुए थे।

सिलिकोसिस पीड़ितसंघ के प्रमुख अमुल्य निधि बताते हैं कि 15 सालों तक राज्य में काबिज बीजेपी सरकार ने इन पीडितों के लिए कुछ नहीं किया। पीड़ितसंघ ने सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) जाकर अपनी गुहार लगाई। इस पर सुप्रीम कोर्ट और एनएचआरसी ने साल 2016 में मानवाधिकार आयोग के पूर्व निदेशक डॉ एचएम सैय्यद की अध्यक्षता में चार सदस्सीय एक कमेटी गठीत की। कमेटी में एचडी साधु, समरुख धारा और अमुल्य निधि शामिल थे। समिति की रिपोर्ट में पीडितों के पुनर्वास, समुचित इलाज और मृतकों के परिजनों को मुआवजे की रकम देने की अनुशंसा की थी। इस अनुशंसा के आधार पर मृतकों के परिजनों को तीन-तीन लाख रुपए का मुआवजा दिया गया लेकिन जो लोग जिंदा है और गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं उन्हें राहत देने की कोई कार्ययोजना नहीं बनाई गई। कई लोग ऐसे हैं जिनके पास खाने को अनाज तक नहीं है। जीते जी जिंदा लाश बन चुके हैं। सरकार ने सिलिकोसिस पीडितों के प्रमाण पत्र तो बना दिए हैं लेकिन उनका फायदा उन्हें कुछ नहीं मिल रहा है।

क्या है सिलिकोसिस-

सिलिकोसिस एक गंभीर बीमारी है। धूल के सुक्ष्म कण सांसों के जरिए फेफड़ों में जाते हैं। यह कण फेफड़ों की कोशिकाओं और नलिकाओं में जमा हो जाते हैं। यह वही नलियां है जिनमें आक्सीजन और कॉर्बन डाइआक्साइड का आदान-प्रदान होता है। धीरे-धीरे ये कण सिमेंट की तरह इन कोशिकाओं में जमा हो जाते हैं और ऑक्सीजन लेने और कॉर्बन डाइआक्साइड छोडने की प्रक्रिया धीरे-धीरे घटने लगती है।

Written by XT Correspondent

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