इंदौर। कोरमा वायरस की महामारी और लॉकडाउन के बीच अब तक का सबसे करुण दृश्य सामने आया है। महाराष्ट्र से आ रहे एक मज़दूर परिवार की बैलगाड़ी खुद मज़दूर हाँकने को मजबूर है। रास्ते में पैसे खत्म होने पर मजदूर ने बैल को महू में पांच हजार रुपए में बेच दिया। इसके बाद कई किलोमीटर से बैल की जगह खुद मज़दूर अपनी गाड़ी को हांक रहा है।
ये दृश्य इंदौर बायपास का है। मुंबई से आगरा जाने वाले इस हाईवे पर हर दिन ऐसी हज़ारों दर्दनाक कहानियाँ हौले-हौले रेंगती हुई आगे बढ़ रही है। कई दिनों से कमोबेश यही नजारा है लेकिन सरकारें अपनी डिंगे हाँक रही है। आँकड़ों की बाज़ीगरी में लगी हुई है।
सवाल इस बात का है कि सरकारें क्या महज अच्छे दिनों में खुद की सुखद अनुभूति और मंत्रमुग्धता के लिए है या फिर ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए। क्या हमारे पास आपदा प्रबंधन के कोई मुकम्मल साधन, संसाधन या क्षमता के नाम पर सिर्फ बातें ही बची है..?
