देवास। एक तरफ देश आज़ाद हुए 72 साल हो चुके हैं लेकिन दूसरी तरफ आदिवासी गांवों में आज भी विकास तो दूर, बुनियादी सुविधाएँ तक नहीं मिल पा रही है। इसकी ताज़ा बानगी आज फिर देवास शहर से महज 34 किमी दूर एक गाँव में देखने को मिली। यहाँ एक व्यक्ति की गम्भीर रूप से तबीयत बिगड़ने पर ग्रामीणों ने खटिया पर लादकर दो किमी का सफ़र तय किया। बारिश और कीचड़ से बचते हुए चार लोगों ने उसे पालकी की तरह अपने कंधों पर उठाया। बारी-बारी से लोग अपना कन्धा बदलते रहे। दो किमी बाद पक्की सड़क से उसे वाहन में अस्पताल पहुँचाया गया।
बरोठा के पास हीरापुर गाँव में बीते कई दशकों से यही स्थिति है। बारिश के चार महीनों में यह इलाका सड़कों से कट जाता है। नाम भले ही बड़ा सुंदर हो लेकिन हीरापुर की किस्मत बहुत खराब है। हालत यह है कि बीते दिनों गुड्डू पिता जगन्नाथसिंह की तबीयत बिगड़ जाने पर ग्रामीणों ने उसे खटिया पर पैदल लादकर अस्पताल तक पहुंचाया।
यह तस्वीर आज भी आदिवासियों की हालत को बयान करती है। उनकी तकदीर में अब तक बुनियादी सुविधाएँ भी नहीं पहुंची हैं। सरकार विकास के कितने ही ढ़ोल पीट लें, ज़मीन की हकीकत में ढोल की पोल उजागर हो जाती है।
ग्रामीण हेम सिंह चौहान, शुभम चौहान, सिकंदर चौहान और विशाल चौहान बताते हैं कि हमने सरपंच व सचिव से भी कई बार गुहार लगाई मगर उनका साफ़ कहना है कि गाँव के लोगों ने हमें वोट नहीं दिए इसलिए यहाँ कुछ भी काम नहीं होगा। इतना ही नहीं इन्हें मध्य प्रदेश सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ भी आज तक नहीं मिल पाया है। प्रधानमंत्री आवास और शौचालय जैसी कई महत्त्वाकांक्षी योजनाएँ भी यहाँ के पात्र गरीबों तक नहीं पहुंच पा रही हैं। ग्राम पंचायत में चुने हुए सरपंच एवं जनप्रतिनिधियों को चुनाव के समय उस क्षेत्र से वोट नहीं मिलने से नाराजगी इसका कारण बताया जाता है। सरपंच प्रतिनिधि घनश्याम मुकाती का कहना है कि गांव में 10 प्रधानमंत्री आवास पूर्ण करवाए हैं। शौचालय भी पूर्ण हो चुके हैं। गांव तक जाने के लिए प्रधानमंत्री रोड भी बना हुआ है, महज 500 मीटर रोड बारिश में खराब है। यह बात मेरी प्राथमिकता में है और इसे जल्द से जल्द बनवा दिया जाएगा।
