देवास। इन दिनों देवास स्थित प्राचीन माता टेकरी पर श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। यहाँ नवरात्रि के दस दिनों में देश के कोने-कोने से बीस लाख से ज़्यादा लोग पहुँचेंगे। चौबीसों घंटे यहाँ कतारें लगी रहती हैं। श्रद्धालुओं के कारवाँ ने यहाँ रात और दिन का अंतर भी पाट दिया है। बीते सालों में टेकरी पर बड़ी तादात में पर्यावरण और प्राकृतिक सौन्दर्य के काम हुए हैं, इससे आगंतुक अभिभूत हैं। पुलिस और प्रशासन ने अतिरिक्त व्यवस्थाएँ की हैं।
टेकरी पर माँ चामुंडा और तुलजा भवानी मंदिरों में पैर रखने भर की जगह नहीं है। इन मंदिरों से श्रद्धालुओं की आस्था जुड़ी है। पुराविद इन्हें 10वीं सदी की राष्ट्रकूट कालीन मानते हैं, तब चट्टानों को उकेर कर प्रतिमाएँ बनाई जाती थी। कवि चंदबरदाई के पृथ्वीराज रासो तथा अंग्रेज़ी के प्रख्यात लेखक ईएम फास्टर की किताब द हिल ऑफ गॉडेस में भी माता टेकरी का उल्लेख मिलता है। शहर का नाम भी इसी वजह से देववासिनी और बाद में देवास पड़ा। शक्ति और साधना के महापर्व नवरात्रि में माँ चामुंडा और तुलजा भवानी का स्वरूप और अधिक आभामान हो जाता है। नवरात्रि के दिनों में यहाँ लगभग 15 से 20 लाख लोग हर साल दर्शन के लिए पहुंचते हैं। हर 6 माह में एक बार खुलने वाली दानपेटियों के आंकड़े बताते हैं कि इनमें करीब 15 से 18 लाख रु। तक की चढ़ोतरी इकट्ठा होती है। इसका उपयोग ट्रस्ट बनाकर विकास कार्यों के लिए किया जाता है।
माता टेकरी को जोड़ा पर्यावरण के सरोकारों से
बीते सालों में प्रशासन ने जन सहयोग से माता टेकरी को पर्यावरण के सरोकारों से भी जोड़ा है। टेकरी पर हजारों पेड़-पौधे रोपकर इसे हरी-भरी करने और बारिश के हजारों गैलन पानी को सहेजकर उसे धरती की रगों तक रिसाने का काम अभी-अभी किया गया है। इससे टेकरी की रंगत दमकी-सी लग रही है। चार किमी लंबे वाकिंग ट्रेक, लाखों पौधों, चहचहाते पक्षियों तथा जल संरचनाओं से यहाँ अब प्रकृति का वैविध्य देखते ही बनता है। नये परिवेश में सजी सँवरी टेकरी को देखना नई उर्जा और सुकून से भर देता है।
गौरतलब है कि बीते तीस सालों में टेकरी का तेजी से क्षरण हुआ। पेड़-पौधे काट कर अतिक्रमण और कांक्रीट के मकान बनाए गए. प्राकृतिक अभ्यारण्य के रूप में रहे घना जंगल खत्म होने और आवाजाही से पशु-पक्षियों की संख्या कमतर हुई. बारिश के पानी को सहेजने व जमीन में रिसाने वाला यहाँ का प्राकृतिक तंत्र उजाड़ा गया। अब टेकरी को पर्यटन की दृष्टि से भी विकसित किया जा रहा है। राज्य सरकार अब दर्शनार्थियों के लिए सुविधाएँ जुटा रही है। यही नहीं इसका सौंदर्यीकरण करके देश के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में भी इसे शामिल किया जा रहा है। वृद्ध और अशक्तजनों की सुविधा के लिए यहाँ रोप वे की सुविधा भी है। सुखद है कि माता टेकरी को अब जन आस्था के साथ पर्यावरणीय सरोकारों से भी जोडा गया है। ताकि अगली पीढ़ी को हम अपने प्राकृतिक संसाधन उसी वैविध्यता के साथ सौंप सके.
अंग्रेज़ी साहित्य की महत्त्वपूर्ण धरोहर द हिल ऑफ़ देवी
इन दिनों नवरात्रि में प्रदेश भर से लाखों श्रद्धालु देवास की माता टेकरी पर पहुँच रहे है लेकिन बहुत कम लोग जानते है कि करीब सौ साल पहले चांमुडा टेकरी का प्राकृतिक वैविध्य देखते ही बनता था। इसे अंग्रेज़ी के प्रख्यात लेखक ईएम फास्टर ने अपनी यात्रा वृत्तांत द हिल ऑफ देवी में वर्णित किया है। इसी किताब के जरिए ही सात समुंदर पार विदेशियों ने भी फास्टर की आंखों से देखी माता टेकरी का सौंदर्य निहारा था।
सौ साल पहले चामुंडा माता टेकरी का प्राकृतिक सौंदर्य कितना नयनाभिराम रहा होगा, इसका अंदाजा आज लगा पाना शायद मुश्किल है। तब न तो देवास शहर का इतना विस्तार हो पाया था और न ही पेड़ कटे थे।
टेकरी व देवास कस्बे पर खूब मोहित थे फास्टर
अंग्रेजी के ख्यात उपन्यासकार ई.एम. फास्टर टेकरी व देवास कस्बे पर इतना मोहित हुए कि उन्होंने अपने यात्रा वृत्तांत का नाम ही द हिल ऑफ देवी के नाम पर कर दिया। उनकी मशहूर किताब ए पैसेज टू इंडिया में भी देवास और माता टेकरी का उल्लेख मिलता है। देवास की सिनीयर रियासत के महाराजा तुकोजीराव पवार तृतीय के राजकीय अतिथि के रूप में 1912 के क्रिसमस पर्व 25 सितंबर को पहली बार ई.एम. फास्टर देवास आए. मीठा तालाब के पास सागर महल में उन्हें अतिथि के रूप में रखा गया। उन्होंने इस कस्बे के प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक वैविध्य का गहरी समझ के साथ अध्ययन किया। 05 जनवरी को वे देवास से लौट गए. लेकिन इन 10 दिनों में उनके लेखक मन पर देवास और माता टेकरी की जो अमिट छाप पड़ी, उसी ने 8 साल बाद 1921 में यहा एक बार पुन: आने के लिए मजबूर कर दिया। इस बार वे यहाँ खूब सारा लिखने के इरादे से ही आए थे। उनका प्रसिद्ध उपन्यास ए पैसेज टू इंडिया व यात्रा वृत्तांत द हिल ऑफ देवी इन्हीं दिनों में देवास के जन-जीवन को छायांकित करता नजर आता है।
छह महीने रूककर निहारते रहे टेकरी का सौन्दर्य
माता टेकरी उन्हें हमेशा आकर्षण और रहस्य का केन्द्र लगती। वे कई बार माता टेकरी के शिखर तक गए लेकिन हर बार एक नया रहस्य और अनूठा आकर्षण उन्हें यहाँ आने के लिए प्रेरित करता रहा। चांदनी रात के उजाले में सागर महल की बुर्ज से मीठा तालाब और माता टेकरी का प्राकृतिक वैविध्य उन्हें लगातार सर्जन के लिए प्रेरित करता। 1921 में वे करीब 6 महीने तक यहाँ रूके और नवरात्रि के दौरान माता टेकरी पर होने वाली विशेष पूजा-अर्चना के भी साक्षी बने। यहाँ राज परिवार किस तरह समारोहपूर्वक राजसी शानो-शोकत से पर्व मनाते थे। इसका उल्लेख उनके उपन्यासों में मिलता है। इस दौरान इंग्लैंड के अपने मित्रो व परिजनों को उन्होंने जो पत्र लिखे है, उनमें भी देवास और माता टेकरी सम्बंधी उल्लेख मिलता है। 1921 में उन्होंने यहाँ के काम काज को समझने के लिए सीनियर रियासत के तुकोजीराव पवार तृतीय के निजी सचिव के रूप में भी काम किया। उन्होंने अपनी आँखों के जरिए देखे माता टेकरी के दृश्यों को भारत ही नहीं बल्कि लाखों विदेशियों को भी दिखाया। उनकी यहाँ रची किताबें अंग्रेज़ी साहित्य की महत्त्वपूर्ण धरोहर है।
