Xpose Today
लेखिका दीपल छतवानी पॉश सर्टिफाइड ट्रेनर और एजुकेटर हैं।
मेघा आईटी प्रोफेशनल है। वह ऑफिस को लेकर तनाव में थी। माँ ने चेहरे को पढ़ लिया पूछा बहुत टेंशन में हो बेटा कोई परेशानी। आमतौर पर कॉरपोरेट जॉब में वर्क प्रेशर होता है लेकिन बात कुछ ऐसी थी की अब वह नौकरी छोड़ने तक का मन बना चुकी थी। माँ को बताया ऑफिस में वर्क प्रेशर यी पॉलिटिक्स नहीं एक सीनियर की छेड़खानी या शारिरिक संबंध बनाने के दबाव से परेशान है।बात मेसेज से शुरू हुई और फिर बेड टच देर रात कॉलिंग और मेसेज करने लगे। जब समझाया तो ऑफिस के कामों को लेकर परेशान करने लगे। यौन उत्पीड़न की इंतहा होने लगी।
फिर मां से बातों ही बातों में याद आया की जब यह जॉब जॉइन किया था तो एचआर की पॉलिसी में पॉश क़ानून लिखा था। तुरंत एचआर द्वारा दी गई बुक को देखा तों POSH Act, 2013 की जानकारी मिनी। POSH का पूरा नाम Prevention of Sexual Harassment of Women at Workplaceहै। यह कानून महिलाओं को कार्यस्थल पर होने वाले यौन उत्पीड़न से सुरक्षा देने का काम करता है। पीड़िता द्वारा शिकायत करने पर हर संस्थान में एक कमेटी होती है पीड़िता की शिकायत पर कमेटी जांच करती है इसके बाद क़ानूनी कारवाई होती है।
मेघा ने दूसरे ही दिन एचआर को ईमेल कर शिकायत कर दी।
मेधा जैसी कई महिलाएं हैं जो कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न का शिकार हो रही हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े बताते हैं
एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो)
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में वर्ष 2018 से 2022 के बीच कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के हर साल औसतन 445 मामले दर्ज किए गए। वर्ष 2022 में दफ्तर या कार्यस्थल पर महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुँचाने (यौन उत्पीड़न) के कुल 419 मामले दर्ज हुए थे।
यह है कानून
कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न की शिकायतों को गंभीरता से लेने और सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करने के लिए भारत में POSH Act, 2013लागू है। POSH का पूरा नाम Prevention of Sexual Harassment of Women at Workplaceहै। यह कानून महिलाओं को कार्यस्थल पर होने वाले यौन उत्पीड़न से सुरक्षा देने और शिकायतों के निपटारे के लिए कानूनी व्यवस्था उपलब्ध कराता है।
क्या है यौन उत्पीड़न?
किसी महिला के प्रति अवांछित शारीरिक संपर्क, यौन संबंध बनाने की मांग या आग्रह, अश्लील टिप्पणी, अश्लील सामग्री दिखाना, यौन प्रकृति का कोई अन्य अवांछित व्यवहार या ऐसा आचरण जिससे महिला को असहज महसूस हो—परिस्थितियों के आधार पर POSH कानून के दायरे में आ सकता है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि मामला केवल कार्यालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं है। काम से जुड़े ऐसे स्थान और परिस्थितियां भी कानून के दायरे में आ सकती हैं जहां महिला अपने रोजगार के सिलसिले में मौजूद हो।
शिकायत के लिए क्या व्यवस्था है?
कानून के तहत निर्धारित संस्थानों में Internal Committee (IC) का गठन किया जाना आवश्यक है। महिला कर्मचारी संबंधित समिति के समक्ष शिकायत कर सकती है। सामान्यतः शिकायत घटना की तारीख से तीन महीने के भीतर लिखित रूप में की जाती है। उचित परिस्थितियों में समिति इस अवधि को आगे भी बढ़ा सकती है।
शिकायत की जांच के दौरान महिला की गरिमा, गोपनीयता और निष्पक्ष प्रक्रिया का ध्यान रखना बेहद महत्वपूर्ण है।
नियोक्ता की भी जिम्मेदारी
POSH कानून केवल शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई करने तक सीमित नहीं है। नियोक्ता की जिम्मेदारी है कि कार्यस्थल पर सुरक्षित वातावरण बनाया जाए, कर्मचारियों को कानून के बारे में जागरूक किया जाए और शिकायतों के लिए प्रभावी व्यवस्था उपलब्ध हो।
क्यों जरूरी है जागरूकता?
कई बार कर्मचारी अपने अधिकारों और शिकायत की प्रक्रिया से अनजान होते हैं। यही कारण है कि POSH कानून की जानकारी केवल HR विभाग या प्रबंधन तक सीमित न रहकर हर कर्मचारी तक पहुंचना जरूरी है।
कानून के अनुसार संगठनों को क्या करना चाहिए: दस या उससे ज़्यादा कर्मचारियों वाले हर ऑफिस में एक आंतरिक समिति बनाएं, जिसकी चेयरपर्सन एक वरिष्ठ महिला हो और कम से कम आधे सदस्य महिलाएं हों। समिति की जानकारी साफ़ तौर पर दिखाएं। नियमित ट्रेनिंग करवाएं, न कि सिर्फ़ साल में एक बार की औपचारिकता। 90 दिनों के भीतर जांच पूरी करें और नतीजों पर 60 दिनों के भीतर कार्रवाई करें। नियमों का पालन न करने पर ₹50,000 तक का जुर्माना लग सकता है, और बार-बार गलती करने पर यह जुर्माना दोगुना हो सकता है।
भटेरी से बोर्डरूम तक: सुरक्षित कार्यस्थल के लिए भारत का लंबा सफर
जब 1992 में राजस्थान की एक ज़मीनी स्तर की कार्यकर्ता (साथिन) भंवरी देवी के साथ बाल विवाह रोकने की कोशिश करने पर गैंग-रेप हुआ, तो भारत में कामकाजी महिलाओं को नौकरी से जुड़ी हिंसा से बचाने के लिए कोई कानून नहीं था। जिस राज्य ने उन्हें नौकरी दी थी, उसने कोई सुरक्षा कवच नहीं दिया, और 1995 में ट्रायल कोर्ट के पक्षपाती फैसले ने उन्हें बरी कर दिया, जिससे उनका दुख और बढ़ गया। उस विफलता से 1997 में विशाखा गाइडलाइंस आईं — यह सुरक्षित कार्यस्थल के लिए नियोक्ताओं को जवाबदेह ठहराने की सुप्रीम कोर्ट की पहली कोशिश थी। लेकिन गाइडलाइंस सिर्फ़ निर्देश थे, कानून नहीं; उनमें न तो कोई सज़ा का प्रावधान था और न ही उन्हें लागू करने का कोई तंत्र।
Deepal Chhatwani
Career Development Center
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