मंदसौर। मध्यप्रदेश के कई इलाकों में कुछ खास मौकों पर अंधविश्वास पर आस्था भारी दिखाई देती है। ऐसा ही एक नजारा मंदसौर के नालछा माता मंदिर पर दशहरे की शाम देखने को मिला। यहां लोग अपनी जान की परवाह किए बगैर धधकती आग में से गुजर रहे थे। माता के प्रसन्न करने के और मन्नतें पूरी होने पर लोग धधकती आग और अंगारों पर से पैदल निकलते हैं। यह प्रथा कई सालों से निभाई जा रही है। हैरानी की बात यह है कि आज तक ना तो कोई आग की चपेट में आया और ना ही किसी को कोई नुकसान हुआ। यह नजारा देखने के लिए इलाके के हजारों भक्त यहां पंहुचते हैं। इसे चूल पर चलना कहा जाता है।
मंदसौर के नालछा माता मंदिर में हर साल दशहरे पर चूल का विशेष आयोजन किया जाता है। सुबह से ही माता के मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगती हैं। मंदिर परिसर में 21 फीट लंबी, ढाई फीट गहरी और डेढ़ फीट चौड़ी खाई खोदी जाती है। इसके बाद माता की पूजा अर्चना की जाती है। पूजा अर्चना के बाद खाई में सूखी लकड़ियां डालकर आग लगाईं जाती है। कुछ ही देर में धधकती आग दहकते अंगारों में बदल जाती है। अंगारों पर घी डालकर लपटे उठाई जाती है।
इसके बाद ढोल धमाकों की थाप पर मंदिर के भोपे मंदिर से निकलकर चूल तक आते हैं और धधकते हुए अंगारों के बीच नंगे पाँव बड़े आराम से निकल जाते हैं। इनके साथ इसी चूल से वे श्रद्धालु भी निकलते हैं जिनकी मन्नत माँ ने पूरी की हो।
आस्था के अंगारों पर चलने का यह पूरा आयोजन प्रशासन की देखरेख में किया जाता है। प्रशासनिक अधिकारियों के साथ एम्बुलेंस, फायर ब्रिगेड, डॉक्टरों की टीम वहां मौजूद रहती हैं। चारों तरफ सुरक्षा के पुख्ता इंतजामात के साथ-साथ पुलिस बल भी लगाया जाता है।
