नरसिंहपुर। आधुनिक युग में भी आदिम युग की तरह जीवन जीने को मजबूर आदिवासियों को जब कहीं से मदद नहीं मिली तो इन्होने खुद ही अपना मुकद्दर लिखने की कसम खाई। शहर जाने के लिए रास्ता नहीं था तो आदिवासियों ने खुद ही पहाड़ काटकर कच्चा रास्ता बना लिया। ग्रामीण सुबह 7 बजे से हाथो में फावड़े कुदाली की मदद से पहाड़ काटकर कच्चा रास्ता बना रहे है।
बिहार के दशरथ मांझी की कहानी तो हम सब सुनी हैं जिसने 23 साल के अथक श्रम से पहाड़ खोदकर रास्ता बना लिया था। ऐसा ही कुछ देखने को मिला नरसिंहपुर के पहाड़ी गांव बिनेकी में। गाँव के लोग आजादी के बाद से ही बुनियादी सुविधाओं के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं। गाँव के लोगों को राशन लेने, अस्पताल जाने या तहसील जाने के लिए 7 किलोमीटर की खड़ी पहाड़ी चढ़ने पड़ती है। अगर कोई बीमार पड़ जाए तो उसे झोली में लादकर ग्रामीणों को पहाड़ी चढ़ना पड़ती है।
इस पहाड़ी को पार करने के चक्कर में अब तक कितने ही आदिवासी अपनी जान गवां चुके हैं। हालाँकि उनके पास पहाड़ी चढ़ने के अलावा कोई रास्ता भी नहीं है। ग्रामीण सांसद से लेकर विधायक तक और जिला कलेक्टर से लेकर सीईओ तक से कई बार गुहार लगा चुके हैं लेकिन किसी ने उनकी नहीं सुनी। खासकर बारिश के दिनों में तो चार महीनों तक सभी ग्रामीण अपने ही गांव में कैद होकर रह जाते हैं।
कहीं से मदद नहीं मिलती देख अब ग्रामीण सुबह 7 बजे से हाथो में फावड़े कुदाली की मदद से पहाड़ काटकर कच्चा रास्ता बना रहे हैं। ताकि कम से कम कच्चे रास्ते से ही सही आने जाने की व्यवस्था तो हो। इस गांव में कोई अपनी बेटी का विवाह भी नहीं करता। गाँव के ज्यादातर युवक कुवारें हैं।
वहीँ जिम्मेदार इस मामले में रटा रटाया जवाब दे रहे हैं कि मामला संज्ञान में आया है कलेक्टर और ट्राइबल विभाग से बातचीत करके उन्हें सुविधाएं मुहैया कराएंगे।
अब तक प्रदेश में कितनी ही सरकारे आकर चली गई लेकिन इस गाँव में सड़क जैसी मूलभूत सुविधाएं अब तक नहीं पहुंच सकी। ग्रामीणों का भी सरकारी सिस्टम पर से विश्वास पूरी तरह उठ चुका है। उन्हें समझ आ गया है कि नेताओं के लिए वह वोट से ज्यादा कुछ नहीं है।
