धार। सरदार सरोवर बांध से प्रभावितों की मुश्किलें थमने का नाम नहीं ले रही है। धार जिले से निरसपुर सहित आसपास के टीन शेड में बांध प्रभावितों को रखा गया था। इन्हें सरकार की तरफ से यहां अब तक खाना भी दिया जा रहा था। प्लाट और मुआवजे की रकम के निपटारे तक केन्द्र सरकार ने इनके खाने और रहने का बंदोबस्त किया था। 15 अक्टूबर इसकी तारीख तय की थी। प्रभावितों में से कई को प्लाट नहीं मिला है। कुछ को मिल गया है तो मकान निर्माण करने की राशि नहीं मिल सकी है। इसी बीच आज से खाना बंद कर दिया गया है। टीन शेड भी निकालना शुरु कर दिया है। निरसरपुर टीन शेड पर आज आदिमजाति कल्याण मंत्री ओमकार मरकाम पंहुचे तो उन्होंने भी हैरानी जताई। मंत्री ने कहा कि खाना क्यों बंद किया जा रहा है और टीन शेड क्यों हटाए जा रहे है। इसे लेकर वे मुख्यमंत्री से बात करेंगे।
निरसपुर के सैकडों बांध प्रभावितों की शिकायतें थमने का नाम नहीं ले रही है। सरदार सरोवर बांध के बैक वाटर की वजह से हटाए गए लोगों को निसरपुर सहित आसपास के इलाकों में अस्थाई टीन शेड तैयार किए गए थे। यहां तमाम तरह की परेशानियों का सामना करना पड रहा था। कई लोगों को भूखंड ही नहीं मिला है। जिसे भूखंड दे दिया गया है उसे निर्माण के लिए अभी तक मुआवजा नहीं दिया गया है। अभी तक जो खाना दिया गया वह अनियमित था और इससे पेट भी नहीं भर पा रहा था। बच्चों का स्कूल छूट गया है। यहां से स्कूल इतनी दूर है कि वहां तक जाना मुमकीन नहीं है। लोगों को रोजगार के लाले पड रहे हैं।
प्रभावितों के प्लाट आवंटन, मुआवजा औऱ पात्र लोगों को अपात्र माने जाने के खेल में बंदरबाट चल रही है। पुनर्बसाहट की भूमि अधिग्रहण में भी कई तरह की गडबडियां सामने आ रही है। सुसारी के पूर्व जनपद सदस्य राजेन्द्र पाटीदार ने एक शिकायत की है जिसमें निसरपुर की एक डेढ हेक्टेयर जमीन का मुआवजा दिया जाने के बाद भी किसान ने ही जमीन पर कब्जा कर रखा है जबकि हकदार पट्टे के लिए भटक रहे हैं। इस जमीन में करीब साढे चार सौ प्रभावितों को पट्टे दिए जाना है। जमीन पर मुआवजा लेने के बाद भी किसान ने फसल उठा रखी है।
केस जीतने के बाद भी ना पैसा मिला ना जमीन
पुनर्बसाहट के नाम पर कई किसान भूमिहीन हो चुके हैं। इन किसानों का कहना है कि प्रभावितों में से कई लोग पुरान जमीन पर भी खेती कर रहे हैं और नई जमीन भी खरीद ली है लेकिन उनके साथ धोखा हुआ है। उनकी जमीन 2001-02 में ही भूमि अधिग्रहण कर पुनर्बसाहट के नाम ले ली थी। जीआरए से केस जीतने के बाद भी उन्हें ना तो दो एकड जमीन मिली और ना ही उचित मुआवजा मिला। नियमानुसार जहां से किसान की जमीन ली गई है उसी स्थान पर उसे कम से कम दो एकड जमीन दी जाना चाहिए। शिक्षक देवराम पाटीदार का कहना है कि वे जल्द ही रिटायर हो जाएगें। वे केस भी जीत चुके हैं लेकिन उन्हें आज तक जमीन नहीं दी गई।
इलाके के ही रहने वाले विनोद पाटीदार की भी यही परेशानी है। उनसे भी सालों पहले पुनर्बसाहट के नाम पर जमीन हडप ली गई लेकिन आज तक नियमों के मुताबिक हमे दी जाने वाली दो एकड जमीन नहीं दी गई। करोडों की बेशकीमती जमीन के बदले उन्हें महज साढे 9 लाख रुपए ही दिए गए।
