May 4, 2026

मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हारों के चेहरे बुझे, बाजारवाद हुआ हावी

आगर-मालवा। आधुनिक सामग्री ने बाजार में एकाधिकार जमा लिया है। इसका सबसे ज्यादा नुकसान मिट्टी के दीये, बर्तन, खिलौने बनाने वालों को हुआ है। इनकी बिक्री पर असर पड़ा है। देशी सामान से ज्यादा विदेशी सामान की खरीदारी से कुम्हारों के चेहरों पर चिंता की लकीरें उभर आई है।

दरअसल मालवा क्षेत्र पारंपरिक मिट्टी के बर्तन और साज सज्जा के सामान बनाने के लिए जाना जाता हैं। यहाँ बड़ी संख्या में शिल्‍पकार मिट्टी को नया आकर देकर अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं। दीपावली के नजदीक आते ही पूरा परिवार दो महीने पहले से ही मिट्टी में जान फूंकने के काम में लग जाता है।

हालाँकि बाजार में रंग बिरंगी लाइट सहित फैंसी वस्तुओं की बिक्री बढ़ने से इनकी बिक्री प्रभावित हुई है। दूसरी तरफ महंगाई बढ़ने से मिट्टी से बनने वाली सामग्री को बनाने में लागत भी बढ़ी है और मुनाफा कम हुआ है। बाजार में आधुनिक सामग्री के एकाधिकार से कई परिवारों ने यह काम करना छोड़ दिया है। वहीँ कई परिवार आज भी ऐसे हैं जो आर्थिक स्थितियां बिगड़ने के बावजूद पुश्तैनी परंपरा को जीवित रखे हुए है। यह परिवार सदियों से दीपावली पर दीपक बनाते चले आ रहे हैं।

Written by XT Correspondent

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