खंडवा। ओंकारेश्वर बाँध में पूर्ण जलभराव और बग़ैर पुनर्वास डूब के विरोध में जारी जल सत्याग्रह सातवें दिन भी जारी है। सत्याग्रहियों की सेहत बिगड़ने लगी है लेकिन सरकार के काम पर जूँ तक नहीं रेंग रही है।
लगातार सात दिनों तक जल सत्याग्रह करने के कारण सत्याग्रहियों के स्वास्थ्य में भी गिरावट आने लगी है। सत्याग्रहियों को शरीर में दर्द और खुजली सहित कई तरह की समस्या हो रही है। उनके शरीर की चमड़ी भी धीरे-धीरे गलने लगी है। बावजूद इसके सत्याग्रही अपनी मांगे माने जाने तक जल सत्याग्रह खत्म नहीं करने पर अड़े हुए हैं।
नर्मदा आंदोलन के प्रमुख आलोक अग्रवाल ने कहा कि सरकार तत्काल बांध का जल स्तर घटाकर 193 मीटर तक लाए और संपूर्ण पुनर्वास के बाद ही आगे पानी भरा जाए।
दूसरी तरफ लगातार जलस्तर बढ़ने के कारण लोगों की परेशानियाँ गहराने लगी है। कामनखेड़ा, घोघलगांव सहित अन्य गांवों के कई घरों में पानी घुस गया है। किसानों का कहना है कि गांव की कुछ कृषि भूमि को तो बैकवाटर में डूब के कारण अधिग्रहित कर लिया गया है लेकिन बची जमीन को शासन ने अधिग्रहित नहीं किया है। इस भूमि के चारों ओर बांध का पानी फैल चुका है। इससे खेत और गांव में जाने के रास्ते बंद हो चुके हैं।
जलस्तर बढ़ने से जिन गांवों की निचली बस्तियों में पानी भरने लगा है वहां से प्रभावित परिवार मकानों से गृहस्थी का सामान निकालने के साथ घरों को तोड़ने लगे हैं। बुधवार को ग्राम एखंड में अपना मकान तोड़ रहे डूब प्रभावित दशरथ पिता चेन्या की मौत हो गई। दशरथ अपने मकान को तोड़ रहा था। इस दौरान एक बड़ी लकड़ी पानी में बहने लगी। वह लकड़ी पकड़ने के प्रयास में दोपहर 3 बजे गहरे पानी में चला गया। वहीं डूबने से उसकी मौत हो गई।
सत्याग्रहियों की मांगे
बांध का जलस्तर 196.60 मीटर तक पहुँच गया तो धाराजी क्षेत्र की 284 हेक्टेयर जमीन टापू में तब्दील हो जाएगी। विस्थापितों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि पुनर्वास पूरा होने के बाद ही ओंकारेश्वर बांध में जल स्तर को बढ़ाया जाए, लेकिन बिना पुनर्वास बांध में लायी जा रही डूब पूर्णतः गैर कानूनी, असंवैधानिक और अन्यायपूर्ण है। विस्थापितों की मांग है कि पानी का स्तर वापस पूर्व के स्तर 193 मीटर पर लाया जाए और विस्थापितों के सम्पूर्ण पुनर्वास के बाद ही बांध में पानी भरा जाये।
