बड़वानी। नर्मदा घाटी के केले दुबई सहित खाडी देशों में एक्सपोर्ट हो रहे है। दुनिया के तमाम देशों में इन केलों की मांग बढती जा रही है। लेकिन सबसे बडी हैरानी की बात ये है कि यहां के किसानों के पास एक्सपोर्ट लायसेंस नहीं होने की वजह से इन्हें मुनाफा नहीं मिल रहा है। इन किसानों की मेहनत का पैसा मुबंई में बैठे उन बिचौलियों को मिल रहा है जिनके पास एक्सपोर्ट लायसेंस है।
नर्मदा घाटी के धार, बड़वानी और खरगोन के किसान केले के उत्पादन में जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं। पूरे इलाके में 55 लाख टिश्यू कल्चर से तैयार किए गए पौधे डेढ़ हजार एकड़ के खेतों में लगाए गए हैं। इन पेडों पर लगने वाले केले की लंबाई के साथ उसकी क्वालिटी एक्सपोर्ट के लायक होती है। साल भर में सैक़डों कंटेनर केले यहां से दुबई समेत खाडी के देशों तक भेजे जाते हैं। दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले भारत के इस इलाके में केले के लिए वातावरण बहुत अच्छा है। यहां का मौसम भी अनुकूल है। नर्मदा घाटी में केले का उत्पादन इतना अधिक होता है कि देश में इसकी खपत हो पाना मुश्किल होता है। इसलिए इसे एक्पोर्ट ही करना पडता है। इराक, इरान और दुबई में इस केले की भारी खपत है। हैरानी की बात यह है कि एक्सपोर्ट क्वालिटी के केले को तैयार करने के लिए टिश्यू कल्चर से तैयार किए गए एक पौधे की कीमत 15 रुपए होती है। इसे तैयार करने के लिए फर्टीलाइजर की भी अतिरिक्त आवश्यकता होती है।
मुंबई के व्यापारियों के पास एक्सपोर्ट लायसेंस होता है। ये लोग नर्मदा घाटी के किसानों से मात्र 1 रुपए प्रति किलो ही ज्यादा मिल पाता है। लेकिन केले की फसल की खपत के लिए इसे मजबूरी में इन एक्सपोर्ट व्यापारियों को औने-पौने दामों में अपनी फसल बेचना पडती है। यहां से जाने वाला केला समुद्री जहाजों के जरिए एक हफ्ते में खाडी देशों तक पंहुचते हैं।
धार जिले के मनावर के रहने वाले केला किसान संतोष लछेटा का कहना है कि इस पूरे इलाके में किसी भी किसान के पास एक्सपोर्ट लायसेंस नहीं है। हमारी सारी मेहनत का मुनाफा मुंबई में बैठे लायसेंसधारी बिचौलियों को मिलता है। यहां से महज 10 फीसदी केला ही हम एक्सपोर्ट कर पाते हैं। जबकि एक्सपोर्ट क्वालिटी केला उगाने के लिए बहुत ज्यादा ध्यान देना पडता है।
बडवानी के केला उत्पादक झक्कू दरबार का कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार की समझ उन्हें नहीं है। पैसा डूबने का खतरा रहता है। इसलिए हम लोग बिचौलियों को ही केला बेचने के लिए मजबूर हैं। वे अपने खेतों से 100 से 150 कंटेनर केला मुंबई के रास्ते विदेशों तक पंहुचाते हैं। उन्हें मुनाफे के नाम पर प्रति किलो एक डेढ रुपए ही ज्यादा मिलता है। लायसेंसधारी बिचौलिए किस भाव में बेचते हैं उन्हें नहीं पता।
