बालाघाट। प्रदेश की पूर्व शिवराज सरकार ने अति पिछड़ी बैगा जनजाति की महिलाओं को स्वास्थ और पोषण आहर देने के लिए एक हजार रूपए प्रतिमाह देने की योजना शुरू की थी। इस योजना को शुरू हुए इतना समय बीत जाने के बाद भी सैकड़ों बैगा महिलाओं को इसका लाभ नहीं मिल रहा है। जिम्मेदारों की उदासीनता के चलते महिलाएं शासन की इस महत्वपूर्ण योजना में शामिल होने के लिए तरस रही है।
दरअसल बालाघाट के सुदूर नक्सल प्रभावित क्षेत्र में निवास कर रहे बैगा परिवार दस्तावेजों के अभाव में योजनाओं से वंचित है। कई मुलभूत सुविधाओं और स्वस्थ जीवन जीने से वंचित बैगा परिवार का जीवन स्तर उठाने के लिए वर्षो से शासन के द्वारा प्रयास किया जा रहा है। चंद व्यवस्था के सहारे चल रहे बैगाओं का जीवन आज भी दयनीय नजर आता है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बिरसा जनपद पंचायत क्षेत्र के अंतर्गत दुरस्थ अडोरी ग्राम पंचायत के अंतर्गत कुण्डेकसा, कुसरी, घूम्मूर बिठली पंचायत व आसपास के इलाकों में निवास कर रहे सैकड़ों बैगा परिवार ऐसे है जो दस्तावेज के अभाव में शासन की महत्वपुर्ण योजना से वंचित है। ऐसे में इस अतिपिछड़ी जनजाति को संरक्षित और बचाकर रखने की शासन-प्रशासन की कोशिश पर पलिता लगता दिखाई दे रहा है।
बात करें बैगा महिलाओं के स्वास्थ्य के लिहाज से मध्यप्रदेश की पूर्व शिवराज सरकार द्वारा शुरू की गई पोषण आहार व अच्छे खानपान के लिए बैगा महिलाओं को एक हजार रूपए प्रतिमाह देने की योजना प्रारंभ की गई थी। जिसके तहत कुछ महिलाए परिवार को ही एक हजार रूपए ही प्रतिमाह मिल रहा है। वहीं सैकड़ों बैगा महिलाएं एैसी है जो जिम्मेदारों की उदासीनता के चलते शासन की इस महत्वपूर्ण योजना को पाने के लिए तरस रही है।
इस संबंध में जब आदिवासी बैगा अंचलों में जाकर जानकारी ली गई तो पता चला कि इस पोषण आहार के लिए बैगा महिलाओं को इस लिए वंचित होना पड़ा क्यों कि इसके पास डिजिटल स्थाई जाति प्रमाण पत्र नही बन पाया है। जिसके लिए बकायदा गांव से 40-45 किलोमीटर दूर तहसील मुख्यालय बिरसा में कई चक्कर काटने के बाद भी प्रमाण पत्र नही बन पाया है।
वर्षो से भटक रहें हैं राशन कार्ड और नामातंरण के लिये
इस ईलाके में 25 से 30 वर्ष के बैगा समाज के युवाओं ने जिम्मेदार शासन की पोल खोलते हुए बताया कि उनका विवाह होने के बाद वे बाल बच्चों वाले हो चुके है। अपने भाई और माता-पिता से अलग होने के बाद भी उनका राशन कार्ड नही बन पाया है। वह कई बार 40-45 किलोमीटर दूर बिरसा तहसील कार्यालय और लोकसेवा केंद्र के चक्कर लगा चुके है। राशन कार्ड नही मिलने से परिवार के लिए अनाज नसीब नही हो रहा है। वहीँ कई योजनाओं का लाभ लेने से वंचित होना पड़ रहा है।
इसके अलावा क्षेत्र में बैगा परिवार की कई वर्षो पुरानी समस्या यह भी है कि उनके जमीन के पट्टे और दस्तावेज वर्षो पुराने है। कई की फौती नही कटी है तो किसी का नामांतरण और शामिल खाते से नाम अलग नही हो पाया है। ऐसे तमाम दस्तावेज नही मिलने के कारण इस अति पिछड़े बैगा परिवार को शासन की कई योजनाओं से हाथ धोना पड़ रहा है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि जमीनी स्तर पर शासन की योजनाओं का कितना लाभ इस संरक्षित करने वाली बैगा समाज को मिल रहा है।
इस संबंध में जानकारों का मानना है कि अधिकतर बैगा परिवार अशिक्षित है और इन्हें कहाँ से क्या बनवाना है और कैसे दस्तावेज बनाना है इसकी जानकारी नही है। इसलिए इन अति पिछड़ी जनजाति को बचाने और उनका हक दिलाने के लिए बेहतर होगा कि एक केंद्र बिंदू में शिविर लगाकर उनके महीनों और वर्षों पुराने दस्तावेज उपलब्ध कराने की समस्या को हल किया जाये। ताकि शासन की तमाम योजनाओं का लाभ इन्हें मिल सकें।
बैगा समाज के महेश बैगा कुण्डेकसा का कहना है कि, “कई बार 45 किलोमीटर दूर बिरसा गया। 2 हजार खर्च किया। फिर भी मेरा राशन कार्ड नही बना है। बार-बार चक्कर लगाकर थक गया हॅू। अब जाना बंद कर दिया। राशन नही मिलता, पांच साल पहले मेरी शादी हो चुकी है, बच्चे है मुझे परिवार चलाने की परेशानी होती है।“
वहीँ बैगा समाज की महिला महेश बैगा कुण्डेकसा का कहना है कि, “कुछ महिलाओं को हजार रूपए मिल रहा है। मुझे एक भी पैसा नही मिला है। प्रमाण पत्र बनाने के लिए बोले है। अब पता नही कब बनता है।“
इस मामले को लेकर कलेक्टर दीपक आर्य का कहना है कि, “दस्तावेज संबंधी समस्या को देखते हुए कैंप लगाये जाते है। आपके द्वारा जिन ग्रामों का नाम बताया गया है वहां जल्द ही कैंप लगाकर ग्रामीणों शासन की योजना का लाभ दिलाने के लिए सभी प्रकार के दस्तावेज बनाकर निराकरण किया जायेगा।
