उमरिया। मवेशियों की सुरक्षा के लिए उनके गले में घंटी बांधी जाती है ताकि उनके मालिक को उस घंटी की आवाज से पता चल जाता है कि मवेशी कहाँ गया है। हालाँकि आधुनिकता के दौर में अब मवेशियों के गले में घंटी विलुप्त होती जा रही है। लेकिन उमरिया जिले के आदिवासी बाहुल्य इलाकों में आज भी मवेशियों का झुंड गुजरता हैं तो उनके गले में बंधी घंटी की आवाज सुनाई देती हैं। यहाँ मवेशियों को पालना रोजगार का साधन नहीं है बल्कि परंपरा को जीवित रखने के लिए वह ऐसा करते हैं।
“बैलों के गले में जब घुंघरू, जीवन का राग सुनाते हैं। गम कोसों दूर हो जाता है, खुशियों के कँवल मुसकाते है।” 70 के दशक में बनी उपकार फिल्म का यह गीत इस समय पर भारत गांवों में बसता है कि स्वीकारोक्ति हुआ करता था। धीरे-धीरे आधुनिकीकरण की दौड़ में ऐसे नज़ारे समाज से विलुप्त होते गए। हालाँकि उमरिया जिले के आदिवासी बाहुल्य इलाकों में मवेशियों के झुंड से बैलों के गले में बंधी घंटी की आवाज आज भी सुनाई देती है। यहाँ आज भी बाहर काम पर जाने और काम से वापस आने का संदेश मवेशियों के गले में बंधी से मिलता है।
मवेशियों की सुरक्षा के लिए शुरू हुई यह परम्परा आधुनिकीकरण के दौर में भी जिले के आदिवासी बाहुल्य इलाकों में जिंदा है। मवेशियों को पालने से लोगों को खास आमदनी तो नही होती लेकिन मवेशियों को पालने और उनसे जुड़े रहने का यह काम अपने आप मे श्रेष्ठ उदाहरण है।
मवेशियों के गले मे घंटी बांधकर उस पर नियंत्रण रखने की यह परंपरा सदियों पुरानी है जो शहरों में न के बराबर दिखाई देती है। गांवो में भी यह परंपरा सिकुड़ने लगी है, लेकिन सुदूर गांवो में लोग आज भी इसे जीवित रखे हुए हैं। जानकारों की माने तो सूर्य अस्त होने के समय पर मवेशियों का झुंड जब गांव में प्रवेश करता है तो घंटियों की आवाज पूरे गांव में एक अद्भुत आनंद पैदा करता है जो लोगों में ऊर्जा का संचार करता है।
विज्ञान की प्रगति के साथ-साथ मानव जीवन के दैनिक दिनचर्या के रंग ठंग भी बदले हैं, जिसका सीधा असर सदियों से चली आ रही परंपराओं की उपयोगिताओं के नष्ट होने के रूप में सामने आ रहा है। यही हाल मवेशियों के झुंड में बजती घंटियों की खनक के विलुप्त होते स्वर के रूप में दिखाई दे रहा है।
