जबलपुर। अब मरीजों को बिना चीरा लगाए ही उनके काम के पर्दे की सर्जरी की जा सकती है। ख़ास बात यह है कि सर्जरी के लिए मरीज को भर्ती भी नहीं करना पड़ता है। मात्र आधे घंटे में मरीज की सर्जरी कर उसे छुट्टी दे दी जाती।
दरअसल जबलपुर में स्थित नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज के ईएनटी विभाग के डॉक्टरों ने कान के पर्दे की सर्जरी की नई तकनीक ईजाद की है। इस तकनीक के तहत मरीज के ब्लड प्लाज्मा की झिल्ली से पर्दा बनाया जाता है। इसके बाद माइक्रोस्कोप से बिना चीरा लगाए कान के पर्दे की सर्जरी की जाती है। यह तकनीक ईएनटी विभाग की एचओडी डॉ. कविता सचदेवा के मार्गदर्शन में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अनिरुद्ध शुक्ला ने पीजी स्टूडेंट डॉ. योगेश सिंह कौरव के सहयोग से ईजाद की है।
डॉक्टरों ने बताया कि आमतौर पर कान की सर्जरी करने के लिए कान के पीछे 3-4 सेमी का चीरा लगाया जाता है। इसके लिए मरीज को तीन से चार दिन आस्पताल में भर्ती किया जाता है। अगर सर्जरी फेल हो जाती है तो दूसरी बार आसानी से कवर नहीं मिलता। जबकि नई तकनीक से बिना चीरा लगाए और मरीज को भर्ती किए सर्जरी की जाती है। खास बात यह है कि सर्जरी फेल होने पर कई बार सर्जरी की जा सकती है।
नई तकनीक के तहत मरीज के रक्त को ब्लड सेपरेशन मशीन सेंटीफ्यूज में डालकर उससे पीआरएफ (प्लेटलेट्स रिच फाइब्रिन) बनाया जाता है। इसे झिल्ली के रूप में कान का पर्दा बनाया जाता है। फिर नए पर्दे को काम के अंदर वाले पर्दे पर ग्राफ्ट कर छेद बंद किया जाता है। डॉक्टरों ने बताया कि जबलपुर में पहली बार हुआ है जब ब्लड प्लाज्मा से कान का पर्दा बनाने का प्रयोग हुआ हो। अब तक किसी भी मेडिकल जर्नल में ऐसी सर्जरी प्रकाशित नहीं हुई है। इस तकनीक से अब तक 25 मरीजों की सर्जरी की जा चुकी है। इनमे से 23 मरीज पूरी तरह ठीक हो चुके हैं। दो मरीजों की दोबारा सर्जरी के जाएगी। सर्जरी के 40 केस पूरे होने के बाद इसे नेशनन-इंटरनेशनल जर्नल में प्रकाशित किया जाएगा।
बता दे कि कान में मुख्यत: दो प्रकार की बीमारियां होती है। एक ऊंचा सुनाई देना और दूसरा कान बहना। ऊंचा सुनाई देना कान की नस से सम्बंधित बीमारी है, जबकि कान बहने का प्रमुख कारण पर्दे में छेद होना है। इससे कान में दर्द, और कम सुनाई जैसी तकलीफ होती है। कान के पर्दे में छेद का एकमात्र इलाज सर्जरी है।
