बालाघाट। मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के एक आदिवासी परिवार के बच्चे इन दिनों दर बदर की ठोकरे खाने को मजबूर है। बच्चों के मां की कुछ दिनों पहले मौत हो चुकी हैं, जबकि पिता दोनों पैर टूटने के कारण अस्पताल में भर्ती है। ऐसे में इन बच्चों के पास ना खाने के लिए रोटी है और ना ही पहनने के लिए कपड़ा है।
सरकार हर साल बैगा आदिवासियों के नाम पर बैगा ओलंपिक का आयोजन कर करोड़ो रुपए फूंक देती हैं, लेकिन जमीन पर बैगा आदिवासियों की हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा है। बालाघाट जिले के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र परसवाड़ा में भी ऐसे कई बैगा आदिवासियों के परिवार हैं, जिन्हें दो वक़्त की रोटी भी नसीब नहीं होती। जनपद पंचायत परसवाड़ा के अंतर्गत वनग्राम कुकड़ा में एक ऐसा ही बैगा परिवार है, जिसके चार बच्चे इन दिनों दर बदर की ठोकरे खाने को मजबूर है।
कुकड़ा गाँव के लोगों बताया कि चारों बच्चों की उम्र बहुत कम है। एक बच्चा 7 साल, दूसरा 5 साल, तीसरा 3 साल और चौथा महज एक महीने का है। ग्रामीण जैसे तैसे अपने घर पर ही रख कर बच्चों की देखभाल कर रहे हैं। लेकिन अब ग्रामीण कह रहे हैं कि हम भी जैसे-तैसे जंगल अपना पेट पाल रहे हैं। ऐसे में कब तक हम इन बच्चों की देखभाल करेंगे।
बता दे कि इन बच्चों की मां का निधन चौथे बच्चे के जन्म के तीन-चार दिनों बाद ही हो गया था। जबकि पिता जंगल में रीच के हमले से बचने के लिए पेड़ से छलांग लगाने के दौरान दोनों टांगे टूटने से अस्पताल में भर्ती है।
ग्राम कुकड़ा के ग्रामीणों द्वारा बताया जा रहा है कि इन चारों बैगा बच्चों का कोई घर नहीं है और ना ही इनके खाने पीने की ही कोई व्यवस्था की जा सकी है, ना ही इन बच्चों के पास तन ढकने भर के लिए कपड़ा है। ऐसे में माता के गुजरने एवं पिता के जख्मी हो जाने के बाद बच्चों की देखरेख के लिए भी कोई नहीं है। बारिश के इस मौसम में भी निर्वस्त्र ही यह बच्चे इधर उधर दिनभर खेलते रहते हैं।
ग्रामीणों द्वारा बताया जा रहा है कि चारों बच्चों के पिता वर्तमान में अस्पताल में पड़े हुए हैं। ऐसे में इनके दूर के रिश्तेदार होने के खातिर एक परिवार ने अपने घर पर चारों बच्चों को पनाह दे रखी है जिनके द्वारा उन्हें जैसे-तैसे दो वक्त का भोजन ही दिया जा रहा है। अब इस परिवार के सदस्यों का भी कहना है कि दूर के रिश्तेदार होने के चलते हम सप्ताह भर इनकी देखरेख कर सकते हैं लेकिन बारिश के मौसम में हम जब काम करने के लिए इधर उधर चले गए तो ऐसे में इन बच्चों के साथ कुछ हुआ तो कौन इनकी जवाबदारी लेगा।
वहीं ग्रामीणों का कहना है कि 4 बच्चों में एक बच्चा तो केवल एक माह भर का है। उसके लिए जैसे-तैसे हम दूध की व्यवस्था करते हैं, लेकिन हम भी रोज-रोज कहां से दूध ख़रीदे। हम भी जंगल जाकर अपना पेट भर पा रहे है। ऐसे में हम कब तक इस तरह इन बच्चों की देखरेख करते रहेंगे। हम घर में नहीं रहे और कोई अप्रिय घटना इन बच्चों के साथ घट गई तो बेवजह ही हम परेशान होंगे। ग्रामीण इन नन्हें चारो बैगा आदिवासी बच्चों की व्यवस्था शासन द्वारा किए जाने की मांग कर रहे हैं।
