देवास। प्रदेश का एक गाँव ऐसा भी है जिसे ‘खिलाड़ियों की खदान’ भी कहा जाता है। लगभग पांच हजार की आबादी वाले इस गाँव में हर साल दर्जनों बच्चे किसी न किसी खेल की तैयारी करने के लिए गाँव से निकलते हैं। इस छोटे से गाँव के खिलाड़ी अब तक 70 नेशनल अवार्ड, 3 एकलव्य अवार्डी, 5 खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में भाग ले चुके हैं। खेलों के कारण गाँव के 10 से अधिक खिलाड़ी नेवी, आर्मी, एसएसबी, आईडीबीपी, बीएसएफ, रेलवे में अच्छी पोस्ट पर पदस्थ है।
देवास जिले की बागली के अंतिम छोर पर बसे इस गाँव का नाम आमलाताज है। गांव में खेती ही रोजगार का प्रमुख साधन है। हालाँकि गाँव के युवाओं ने इस गाँव को अलग पहचान दी है। गाँव के कई युवा खेलों में अपनी एक अलग पहचान बना चुके हैं और कई बनाने में जुटे हुए हैं। गाँव के रहने वाले विशाल ठाकुर, आनंद सेंधव और विश्वजीत सिंह एकलव्य अवार्डी में, प्रदीप ठाकुर, जोगेन्द्रसिंह, विशाल ठाकुर, आनंद सेंधव, विश्वजीत और कुलदीपसिंह अंतरराष्ट्रीय स्तर प्रतियोगिता में जबकी गोपाल ठाकुर भारत सरकार की खेलो इंडिया खेलो में भाग ले चुके हैं।
खेलों के कारण ही आनंद सेंधव और विशाल ठाकुर मुंबई नेवी में, जोगेन्द्रसिंह और शिवम ठाकुर आर्मी में, कुलदीप सिंह और विश्वजीत सिंह एसएसबी में, सुनील प्रजापत आईडीबीपी में, फारूक मंसूरी बीएसएफ में, चेतन रेलवे में तैनात है। गाँव के और भी युवा है जो खेलों के कारण अच्छे मुकाम पर पहुँच चुके हैं। बता दे कि विशाल ठाकुर और आनंद सेंधव ने साल 2019 में न्यूज़ीलैंड में हुए शैलिंग वाटर स्पोर्ट के विश्वकप में हिस्सा लिया था। फ़िलहाल दोनों ओलंपिक में भाग लेने हेतु दुबई अबू धाबी जा रहे हैं जहाँ ट्रायल होना है।
छोटे से आमलाताज गाँव के खिलाड़ियों की खदान बनने की कहानी भी दिलचस्प है। गाँव के रहने वाले जयवर्धन सेंधव, वीरेंद्र ठाकुर, अर्जुन पाटीदार और विकास पाटीदार टीवी पर फिल्मों को देखकर उछल कूद और एक्साइज किया करते थे। इनके कुछ दोस्त आवासीय विद्यालय सीहोर में थे जहाँ रोजाना जूडो व ताइक्वांडो क्लास होती है। छुट्टियों में सभी दोस्त मिलकर जूडो और ताइक्वांडो की प्रैक्टिस करते थे। इसी दौरान जयवर्धन सेंधव का चयन जूडो में हुआ। इसी बीच जोगेन्द्रसिंह ने वाटर स्पोर्ट शैलिंग के भोपाल प्रशिक्षण हेतु आवेदन किया। प्रशिक्षण के लिये तैराकी आवश्यक थी जो गाँव के कुओं और नालों में तैरकर युवाओं ने सीखी। धीरे-धीरे अन्य साथी भी शैलिंग व रोविंग के प्रशिक्षण की तैयारियों में जुटे और वाटर स्पोर्ट का प्रशिक्षण प्राप्त करने लगे।
जोगेन्द्रसिंह ने शैलिंग में अच्छा प्रदर्शन किया और प्रतियोगिताओ में भाग्य आजमाने से लेकर खेल नियम और उसकी बारीकियों को बच्चे से सीखा। जोगेन्द्रसिंह ने अपने साथियों को भी प्रशिक्षण दिया, जिससे उन्हें भी सफलता मिलने लगी। युवाओं की कड़ी मेहनत का ही नतीजा है कि छोटे से गाँव के इतने सारे बच्चे आज खेलों की बदौलत अपना और गाँव का नाम रोशन कर रहे हैं।
हालाँकि यह विडंबना ही है कि जिस गाँव के बच्चे वाटर स्पोर्ट शैलिंग, रोविंग, घुड़सवारी, एथलेटिक्स, शूटिंग, ताइक्वांडो जूडो सहित अन्य खेलो में इतना अच्छा प्रदर्शन कर रहे हो, उस गाँव में ना खेल का मैदान है और ना ही खिलाड़ियों की सुविधा के लिए अन्य इंतजाम। ग्रामीणों की माने तो गाँव के बच्चों को स्विमिंग पूल व जिम आदि सुविधा मिल जाए तो वह और भी अच्छा प्रदर्शन करेंगे। इतने मेडल व राष्ट्रीय अवार्ड एक ही गांव में मिलने के बाद भी शासन प्रशासन का कोई ध्यान नहीं है। बच्चे एक दूसरे साथियों की मदद से स्वयं खेल की बारीकीयो को समझते हैं जबकि इस गांव को खेलो के लिए विशेष दर्जा मिलना चाहिए।
