उमरिया। बाँधवंगढ़ के जंगल को आज बाघों के सरंक्षण के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। यहाँ 100 से भी ज्यादा बाघ रहते हैं। लेकिन कई लोगों को यहाँ पता नहीं है कि बाघों के सरंक्षण का केंद्र बना बाँधवंगढ़ कभी दुनिया भर में शिकारगाह के रूप में प्रसिद्ध था। यहाँ देशी-विदेश से राजा-महाराज शिकार करने के लिए आते थे। हालाँकि एक गर्भवती बाघिन के शिकार के बाद अंतिम शासक महाराजा मार्तण्ड सिंह ने इस क्षेत्र को बाघों के संरक्षण के लिए सरकार को सौंप दिया था।
दरअसल बाँधवंगढ़ टाइगर रिजर्व का जंगल किसी समय रीवा राजशाही की निजी संपत्ति और शिकारगाह हुआ करता था। दूर-दूर से राजा-महाराजा यहाँ शिकार करने आते थे। ऊंची-ऊंची पहाड़ियों के ऊपर से हेलु (बाघों की पतासाजी करने का यंत्र) लगाकर बाघों की खोज की जाती थी और फिर उनका शिकार किया जाता था।
21 मार्च 1954 को शाम के समय रीवा रियासत के अंतिम शासक महाराजा मार्तण्ड सिंह अपनी बंदूक लेकर शिकार पर निकले। बाँधवंगढ़ से पनपथा सेंचुरी मार्ग के बीच के जंगल में शिकार के दौरान उनकी गोली बाघिन के शरीर में लगी। करीब डेढ़ मील जाने के बाद बाघिन की मौत हो गई। किवदंती है कि इस 108 वीं बाघिन के शिकार के बाद जब उसके शव को राजा के सामने लाया गया तो पता चला कि वह गर्भवती थी। उसके पेट में दो जीवित बच्चे थे जो कुछ ही समय बाद मर गए।
यह देख महाराजा का मन शिकार से उठ गया और उन्होंने उसी समय बंदूक छोड़कर शिकार त्याग दिया। बाद में 1967 में महाराजा मार्तण्ड ने बाँधवंगढ़ का पूरा जंगल बाघ सहित अन्य वन्य जीवों के सरंक्षण की शर्त पर मध्यप्रदेश शासन को सौंप दिया। जिस समय मानव जाति वनो के विनाश की ओर अग्रसर थी, उस समय महाराजा मार्तण्ड के इस अनूठे कदम से ही आज बाँधवंगढ़ बाघों के सरंक्षण का सबसे बड़ा केंद्र बनकर सामने आया है। बाँधवंगढ़ में एक शिलालेख है जो इस पूरे घटनाक्रम की लिखित गवाही है।
महाराजा मार्तण्ड द्वारा बाँधवंगढ़ के 105 वर्ग किलोमीटर के जंगल को मध्य प्रदेश सरकार को सौंपने के बाद 1968 में निटिफिकेशन के जरिए बाँधवंगढ़ नेशनल आस्तित्व में आया। सरकार ने साल दर साल बाँधवंगढ़ में वन्य जीवों के संरक्षण के प्रयास तेज किए। साल 1993 में इसे टाइगर रिजर्व बना दिया गया। साल 2013 में नोटिफिकेशन के जरिए बाँधवंगढ़ टाइगर रिजर्व का एरिया 1540 वर्ग किमी कर दिया गया।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जैसे-जैसे बाँधवंगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्रफल में वृद्धि हुई वैसे-वैसे वन्य जीवों को रहवास और आहार की जगह मिलती गई। वहीँ पर्यटन के मामले में भी बाँधवंगढ़ टाइगर रिज़र्व देश दुनिया मे जाना जाने लगा। पार्क प्रबंधन के मुताबिक मध्यप्रदेश को टाइगर स्टेट का दर्जा दिलाने में बाँधवंगढ़ टाइगर रिजर्व की अहम भूमिका है और वे इसे गर्व का विषय मानते हैं।
बाँधवंगढ़ टाइगर रिजर्व बाघ दर्शन पर्यटन के साथ साथ सदियों से धार्मिक आस्था का केंद्र बिंदु रहा है। यहाँ ऐतिहासिक किले के समीप स्थित रामजानकी मंदिर में सालाना कृष्ण जन्माष्टमी को विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। मेले का उद्घाटन आज भी परंपरागत रूप स्व. रीवा रियासत के वंसज करते हैं। इसके अलावा यहां कबीर गुफा और संत सेन की भी समाधि है। शिकारगाह से बाघों के सरंक्षण के केंद्र के रूप में उभरे बाँधवंगढ़ टाइगर रिज़र्व में 2018 की गणना के नतीजों में 110 से 135 बाघों की गणना का आकलन हुआ है जो निश्चित रूप से बाघ सरंक्षण की दिशा में किये गए कारगर प्रयासों को साबित करता है। साथ ही रीवा रियासत के अंतिम महाराजा मार्तण्ड के उस मंसूबे को भी पूरा करता है जिस शर्त पर उन्होंने बाँधवंगढ़ की जमीन सरकार को सौपीं थी।
