बागली। 2005 के भयावह हादसे के बाद प्रसिद्ध तीर्थ धाराजी को प्रशासन ने डेंजर जोन घोषित कर इसे श्रद्धालुओं के लिए प्रतिबंधित कर दिया है। तब से अब तक पर्वों पर यहाँ किसी को स्नान की अनुमति नहीं है। अब इलाके के लोग फिर से इसके पुनुरुत्थान के लिए लामबंद हो चुके हैं।
अप्रैल 2005 में यहाँ बाँध का पानी छोड़ दिए जाने से करीब सौ लोगों की मौत हो गई थी। इसमें प्रशासन की बड़ी किरकिरी हुई थी।
दो साल बाद ओकारेश्वर परियोजना में डूब जाने से नर्मदा नदी किनारे यह पवित्र रमणीय स्थान जलमग्न हो गया। यहाँ 192 मीटर ऊँचा जलजमाव हो गया है। कमज़ोर राजनीतिक इच्छा शक्ति से मालवा निमाड़ का यह श्रद्धास्थल विलुप्त हो गया। पर्व स्नान पर धारा 144 लगाकर लोगों को बेरिकेट्स लगाकर रोका जाता है। 2007 के बाद से यहां पर स्नान सहित अन्य धार्मिक कार्य पूर्ण रूप से प्रतिबंधित हो चुके हैं। नर्मदा जयंती भी जैसे तैसे श्रद्धालु डर के साए में मनाते हैं।
उधर नर्मदा किनारे ही संत सिंगाजी समाधि स्थल को बाँध में जलमग्न होने से तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उस स्थान को ऊँचा उठाकर श्रद्धा बरकरार रखी।
बीते कुछ महीनों से सीता वन उत्थान सेवा समिति से जुड़े कुछ श्रद्धालु धाराजी पुनर्स्थापना की मांग करते रहे हैं । 13 अक्टूबर को पीपरी के समीप सीता वन कुंड पर श्रद्धालुओं की एक बैठक में आपसी विचार-विमर्श से तय किया जाएगा कि नर्मदा का जल सीताकुंड तक लाकर पवित्र स्नान पुनः शुरू किया जाए ।
इसके पूर्व 9 अक्टूबर को बागली छत्रपति हनुमान मंदिर में भी बैठक होगी, जिसमें आस्था का केंद्र धाराजी स्नान पुनः आरंभ करने पर चर्चा होगी। लोगों का मानना है कि ऐसा हो सका तो लाखों श्रद्धालु लाभान्वित होंगे और इलाके का पर्यटन भी विकसित होगा।
क्यों हुआ स्नान प्रतिबंधित
अप्रैल 2005 में धाराजी के नदी क्षेत्र में सर्वपितृ अमावस्या पर एनवीडीए ने अचानक पानी छोड़ दिया, जिससे कई लोगों की मौत हो गई थी।पानी छोड़ने की सूचना श्रद्धालुओं को नहीं हो सकी।आधिकारिक तौर पर 68 लोग इस घटना में मारे गए जबकि 70 से अधिक श्रद्धालु मिसिंग रहे। उसी के बाद से यहां पर स्नान प्रतिबंधित हो गया। अंतिम स्थान अप्रैल 2007 के बाद इस स्थान पर धारा 144 लगाकर इसे पूरी तरह बंद कर दिया गया।
अब श्रद्धालुओं की मांग है कि धारा जी का प्रतीक स्नान सीता कुंड में आरंभ कर दिया जाए ताकि श्रद्धालुओं की आस्था बनी रहे।एनवीडीए ने पंचायत धारडी कोथमीर आदि गांव का विस्थापन भी कर दिया है। इस बार भी सर्वपितृ अमावस्या पर कानून की सख्ती के चलते पर्व स्नान नहीं हो पाया।
